इतना तो करना स्वामी, जब प्राण तन से निकले।
श्रीधाम वृंदावन हो, नव-कुंज-द्रुम सघन हो।
मोहन में मन मगन हो, जब प्राण तन से निकले॥ [1]
श्रीयमुना का पुलिन हो, सुंदर खिला नलिन हो।
किंचित् न चित्त मलिन हो, जब प्राण तन से निकले॥ [2]
जन ज़ोर पाणि माँगे, कब ऐसा भाग जागे।
‘वल्लभ' हो श्याम आगे, जब प्राण तन से निकले॥ [3]
- गोस्वामी वल्लभ जी, अभिलाष्टकम
हे करुणामय स्वामी, इतनी कृपा करना कि जब मेरे प्राण तन से निकलें, तो मैं श्री धाम वृंदावन में रहूँ और वहां सघन वृक्षों के किसी कुंज में बसा हुआ होऊँ। जब मेरे प्राण मन से निकलें, तो मेरा मन श्री बाँके बिहारी में मगन हो। [1]
जब तन से प्राण निकलें, तो श्री यमुना जी का किनारा हो और सुंदर कमल खिले हुए हों। ऐसी कृपा हो कि प्राण निकलते समय मेरा मन एक क्षण के लिए भी मलिन न हो। [2]
गोस्वामी श्री वल्लभ जी कहते हैं, "मैं हाथ जोड़ कर यही प्रार्थना करता हूँ कि मेरा भाग्य ऐसा उदित हो कि जब मेरे प्राण तन से निकलें, तो श्यामसुंदर मेरे सामने अवश्य हों।" [3]
श्रीधाम वृंदावन हो, नव-कुंज-द्रुम सघन हो।
मोहन में मन मगन हो, जब प्राण तन से निकले॥ [1]
श्रीयमुना का पुलिन हो, सुंदर खिला नलिन हो।
किंचित् न चित्त मलिन हो, जब प्राण तन से निकले॥ [2]
जन ज़ोर पाणि माँगे, कब ऐसा भाग जागे।
‘वल्लभ' हो श्याम आगे, जब प्राण तन से निकले॥ [3]
- गोस्वामी वल्लभ जी, अभिलाष्टकम
हे करुणामय स्वामी, इतनी कृपा करना कि जब मेरे प्राण तन से निकलें, तो मैं श्री धाम वृंदावन में रहूँ और वहां सघन वृक्षों के किसी कुंज में बसा हुआ होऊँ। जब मेरे प्राण मन से निकलें, तो मेरा मन श्री बाँके बिहारी में मगन हो। [1]
जब तन से प्राण निकलें, तो श्री यमुना जी का किनारा हो और सुंदर कमल खिले हुए हों। ऐसी कृपा हो कि प्राण निकलते समय मेरा मन एक क्षण के लिए भी मलिन न हो। [2]
गोस्वामी श्री वल्लभ जी कहते हैं, "मैं हाथ जोड़ कर यही प्रार्थना करता हूँ कि मेरा भाग्य ऐसा उदित हो कि जब मेरे प्राण तन से निकलें, तो श्यामसुंदर मेरे सामने अवश्य हों।" [3]

