(राग त्रिलंग, त्रिताल)
सखी हों राधा चरण उपासी।
नित रहूँ गरवीली मन में, करती नित्त खवासी ॥ [1]
सेवाकुञ्ज की सघन लता में, सदा बनी सुखरासी ।
सर्वस 'श्रीगोपाल' प्रिया की, बनी रहूँ निज दासी ॥ [2]
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (117)
श्री राधा की एक अंतरंग सखी दूसरी सखी से कहती है: हे सखी, मैं तो श्री राधा चरणों की ही दृढ़ उपासी हूँ । उनके चरणों के अनन्य बल के गर्व से ही दिन रात भरी रहती हूँ एवं उनकी ही निज सेवा में मैं नित्य लगी रहती हूँ । [1]
सुख की राशि श्री राधा सदा सेवा कुंज की सघन लताओं में विहार करती हैं । श्री गोपाल दास जी कहते हैं कि मैं भी सेवा कुंज में ही उनकी सदा दासी बनी रहती हूँ । [2]
सखी हों राधा चरण उपासी।
नित रहूँ गरवीली मन में, करती नित्त खवासी ॥ [1]
सेवाकुञ्ज की सघन लता में, सदा बनी सुखरासी ।
सर्वस 'श्रीगोपाल' प्रिया की, बनी रहूँ निज दासी ॥ [2]
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (117)
श्री राधा की एक अंतरंग सखी दूसरी सखी से कहती है: हे सखी, मैं तो श्री राधा चरणों की ही दृढ़ उपासी हूँ । उनके चरणों के अनन्य बल के गर्व से ही दिन रात भरी रहती हूँ एवं उनकी ही निज सेवा में मैं नित्य लगी रहती हूँ । [1]
सुख की राशि श्री राधा सदा सेवा कुंज की सघन लताओं में विहार करती हैं । श्री गोपाल दास जी कहते हैं कि मैं भी सेवा कुंज में ही उनकी सदा दासी बनी रहती हूँ । [2]

