दीन दुख हरनी तू वेदन में वरनी तू - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद

दीन दुख हरनी तू वेदन में वरनी तू - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद

(कवित्त)
दीन दुख हरनी तू वेदन में वरनी तू,
आनन्द की करनी दरनी यम फाँसनी। [1]
दास जन तारन तू सोक गन गारन तू,
दुष्ट दल मारन पूजैया जन आसनी॥ [2]
बलबीर करता तू घट घट बरता तू,
सुभ काज सरता तू हरता हिरासनी। [3]
सदां सुखरासनी तू संपत्ति प्रकासनी मो,
पातक बिनास राधे वृन्दावन बासनी॥ [4]

- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद

जो दीन दुखियों का दुख हरण करने वाली हैं, वेदों द्वारा वर्णित हैं, आनंद को प्रदान करने वाली हैं, एवं यमराज की फाँसी को काटने वाली हैं। [1]

जो अपने दासों को तारने वाली हैं, शोक का हरण करने वाली हैं, दुष्टों का संहार करने वाली हैं, एवं अपने जनों की समस्त आशाओं को पूर्ण करने वाली हैं। [2]

जो श्री लाल बलबीर की कर्ता धर्ता हैं, जो घट घट में वास करने वाली हैं, शुभ काज की सरता हैं, एवं कलेशों को दूर करने वाली हैं। [3]

जो सदा सुख की राशि हैं, जो प्रेम रूपी सम्पति का प्रकाश करने वाली हैं, ऐसी श्री वृंदावन की स्वामिनी, श्री राधे, मुझ पर अपनी कृपा बरसाकर मेरा उद्धार करें। [4]