रे मन, झूठी जग की प्रीत - रसिक वाणी

रे मन, झूठी जग की प्रीत - रसिक वाणी

रे मन, झूठी जग की प्रीत ।
नेह लगा राधावल्लभ सौं, जो है साँचौ मीत ॥ [1]
ना कोई बेटा ना कोई नाती, मतलब की है प्रीत ।
क्यों खोयौ माया के भ्रम में, तज झूठी परतीत ॥ [2]
छोड़ जगत सौं मोह अरे मन, गा मोहन के गीत ।
साँचौ नाम एक राधे कौ, होय हमेशा जीत ॥ [3]

- रसिक वाणी
 [लक्ष्मण प्रसाद गौड़, वृंदावन]


अरे मन, इस संसार का प्रेम झूठा है । तू तो केवल श्री राधावल्लभ से ही अब अनन्य प्रेम कर जो तेरे सच्चे मित्र हैं । [1]

कोई भी वास्तव में तेरा अपना नहीं है, चाहे वह तेरा बेटा हो या पोता; हर कोई मतलब से ही प्रेम करता है । तू सांसारिक मोह-माया में लक्ष्यहीन होकर क्यों भटक रहा है ? अब इस मर्म को जानकर झूठे विश्वास को त्याग । [2]

अरे मन, संसार के मोह को छोड़ अब तू मोहन (भगवान कृष्ण) के प्रेम भरे गीत गा । सच्चा नाम केवल एक "राधे" है, जिसको लेने से तेरी सदैव विजय ही विजय होगी । [3]