प्रेम-रूप दर्पन अहो, रचै अजूबो खेल ।
यामें अपनो रूप कछु, लखि परिहै अनमेल ॥
- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (5)
प्रेम-रूपी दर्पण में अद्भुत खेल रचा हुआ है, क्योंकि उसमें अपना स्वरूप कुछ-कुछ अनमेल-सा दिखाई देता है।
यामें अपनो रूप कछु, लखि परिहै अनमेल ॥
- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (5)
प्रेम-रूपी दर्पण में अद्भुत खेल रचा हुआ है, क्योंकि उसमें अपना स्वरूप कुछ-कुछ अनमेल-सा दिखाई देता है।

