(राग किदारा)
मानुनी मानु कीओ किह काज।
रहत अधीन दीन मोहन जिउ बाह गहे की लाज ॥ [1]
तू वाँ की सोभा संपत्ति है वह तव परमसमाज ।
केवल मुसकि मिलो श्री भामुनि चलिए नवसत साज ॥ [2]
- श्री केवल राम जी, रास मान के पद (18)
एक सखी, माननी श्री राधिका से कहती हैं, हे प्यारी, तुमने किस कारण अपने प्रियतम से मान किया हुआ है ? प्रियतम श्याम सुंदर तो सदा तुम्हारे अधीन रहते हैं एवं तुम्हारी ही शरण में हैं, उनके ह्रदय का ख़्याल कीजिए । [1]
तुम उनकी सौंदर्य निधि हो, वह तुम्हारे परम अंतरंग संगी हैं । श्री केवलराम जी कहते हैं कि हे सखी, तुम तुरंत जाकर अपने प्रियतम श्यामसुन्दर से सोलह श्रृंगार धारण कर, प्रसन्नता पूर्वक मिलो । [2]
मानुनी मानु कीओ किह काज।
रहत अधीन दीन मोहन जिउ बाह गहे की लाज ॥ [1]
तू वाँ की सोभा संपत्ति है वह तव परमसमाज ।
केवल मुसकि मिलो श्री भामुनि चलिए नवसत साज ॥ [2]
- श्री केवल राम जी, रास मान के पद (18)
एक सखी, माननी श्री राधिका से कहती हैं, हे प्यारी, तुमने किस कारण अपने प्रियतम से मान किया हुआ है ? प्रियतम श्याम सुंदर तो सदा तुम्हारे अधीन रहते हैं एवं तुम्हारी ही शरण में हैं, उनके ह्रदय का ख़्याल कीजिए । [1]
तुम उनकी सौंदर्य निधि हो, वह तुम्हारे परम अंतरंग संगी हैं । श्री केवलराम जी कहते हैं कि हे सखी, तुम तुरंत जाकर अपने प्रियतम श्यामसुन्दर से सोलह श्रृंगार धारण कर, प्रसन्नता पूर्वक मिलो । [2]

