(सवैया)
हम देखेंगे दर्शन देने हमें, कब लौं तुम मोहन! आते नहीं।
तुम आवोगे नाथ! नहीं जब लौं, तब लौं हम भोजन पाते नहीं॥ [1]
बस और विशेष हमारा है क्या? विनती कुछ और सुनाते नहीं।
हम रखेंगे प्राण नहीं अपने, यदि दर्शन आप दिखाते नहीं॥ [2]
- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’
एक भक्त श्यामसुंदर से कहता है—हे प्यारे! हम भी अब देखेंगे कि तुम कब तक हमें अपने साक्षात दर्शन से वंचित रखते हो? अब हमारी भी प्रतिज्ञा है, जब तक तुम आकर हमें दर्शन नहीं दोगे, तब तक हम भोजन नहीं करेंगे। [1]
हमारा आपके अतिरिक्त और है ही कौन? और हम कोई और विनती भी नहीं करते। यदि आप हमें अपना दर्शन नहीं देंगे, तो हम अपने प्राण किसके लिए रखें? [2]
हम देखेंगे दर्शन देने हमें, कब लौं तुम मोहन! आते नहीं।
तुम आवोगे नाथ! नहीं जब लौं, तब लौं हम भोजन पाते नहीं॥ [1]
बस और विशेष हमारा है क्या? विनती कुछ और सुनाते नहीं।
हम रखेंगे प्राण नहीं अपने, यदि दर्शन आप दिखाते नहीं॥ [2]
- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’
एक भक्त श्यामसुंदर से कहता है—हे प्यारे! हम भी अब देखेंगे कि तुम कब तक हमें अपने साक्षात दर्शन से वंचित रखते हो? अब हमारी भी प्रतिज्ञा है, जब तक तुम आकर हमें दर्शन नहीं दोगे, तब तक हम भोजन नहीं करेंगे। [1]
हमारा आपके अतिरिक्त और है ही कौन? और हम कोई और विनती भी नहीं करते। यदि आप हमें अपना दर्शन नहीं देंगे, तो हम अपने प्राण किसके लिए रखें? [2]

