हीरा कौं ललिचात लिवासी, परचौ पूँजी न मर्मी ।
श्रीनागरीदासी विहारै चाहत, बिना अनन्य धन धर्मी ॥
- श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जु की वाणी, साखी (7)
ठौर-ठौर पर श्रद्धा रखने वाले जन सर्वोपरी नित्य-विहार-रस रूपी हीरे को ललचाते हैं, परंतु उन्हें इस वस्तु के स्वरूप का ठीक से ज्ञान नहीं है; अर्थात् वे अनन्य धर्म के मर्म को नहीं जानते। इस नित्य-विहार-रस में प्रवेश बिना अनन्य धर्म का पालन किए कदापि नहीं हो सकता।
श्रीनागरीदासी विहारै चाहत, बिना अनन्य धन धर्मी ॥
- श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जु की वाणी, साखी (7)
ठौर-ठौर पर श्रद्धा रखने वाले जन सर्वोपरी नित्य-विहार-रस रूपी हीरे को ललचाते हैं, परंतु उन्हें इस वस्तु के स्वरूप का ठीक से ज्ञान नहीं है; अर्थात् वे अनन्य धर्म के मर्म को नहीं जानते। इस नित्य-विहार-रस में प्रवेश बिना अनन्य धर्म का पालन किए कदापि नहीं हो सकता।

