आजु की शोभा कही न जाइ -  श्री चतुर दास जी की वाणी, रस के पद (4)

आजु की शोभा कही न जाइ - श्री चतुर दास जी की वाणी, रस के पद (4)

आजु की शोभा कही न जाइ ।
श्रीहरिदासी विपुल विहारिनि सरस नागरी गाइ ॥ [1]
नरहरि रसिक सुललित किसोरी मोहिनी ललित सुख पाइ ।
चतुर स्वामिनी की छवि ऊपर, निरखि निरखि बलि जाइ ॥ [2]

- श्री चतुर दास जी, श्री चतुर दास जी की वाणी, रस के पद (4)

अरी सखी, आज की शोभा किस भांति अभिव्यक्त करूं, कहने में नहीं आ रही है। स्वामी श्री हरिदास जी, श्री वीठल विपुलदेवजी, श्री विहारिनदेवजी, श्री सरसदासजी एवं श्री नागरीदासजी श्री प्रियाजी (श्री राधा) की रूप माधुरी का गान कर रहे हैं । [1]

श्री नरहरिदासजी, श्री रसिकदासजी, श्री ललित किशोरीदासजी एवं श्री ललित मोहिनी दासजी उसे सुन-सुन कर सुखी हो रहे हैं और चतुरदासजी उनकी छवि को निरख कर अपने आप को न्यौछावर कर रहे हैं । [2]