(दोहा)
नित नवतन नेही महा, कहा जु गति जल मीन।
मोहन-रस बस मोहिनी, रहत सदा आधीन॥
(पद)
मोहन मोहिनी आधीन।
रहें अति आसक्त अनुदिन कहा गति जल मीन॥ [1]
नित्य नवतन नेह नेही परस्पर रस-लीन।
हित श्रीहरिप्रिया रसिकन हेत बिबि तन कीन॥ [2]
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (34)
(दोहा)
यह मोहन [कृष्ण] रस के वश होकर सदा मोहिनी जू [राधा] के आधीन रहते हैं। इनका स्नेह नित्य नूतन रहता है। इसके सामने जल और मीन के स्नेह की कोई उपमा युक्तिसंगत नहीं है।
(पद)
ये मोहन सदा मोहनी जी के आधीन रहते हैं। इनकी आसक्ति इतनी प्रबल है कि इनके प्रेम के सामने जल और मीन की उपमा तुच्छ प्रतीत होती है। (मछली जल के वियोग में तो अपने प्राणों को त्याग देती है, परन्तु जल में रहने पर उसका प्रेम जल के प्रति नित्य नहीं बढ़ता है। और दूसरा जैसा मछली का जल के प्रति प्रेम है, वैसा जल का मछली के प्रति नहीं है। अत: दिव्य दंपति को मीन एवं जल की उपमा देना ग़लत है ) [1]
इन दोनों का प्रेम नित्य नूतन है क्योंकि ये सदा परस्पर रस में लीन रहते हैं इसलिये इनका प्रेम क्षण-क्षण में बढ़ता रहता है।
वास्तविक तो श्रीहरि एवं प्रिया का तत्वांश में एक ही स्वरूप है। श्रीहितु सहचरी जी और रसिकों के लिये ही आपने दो स्वरूप धारण कर रखे हैं। [2]
नित नवतन नेही महा, कहा जु गति जल मीन।
मोहन-रस बस मोहिनी, रहत सदा आधीन॥
(पद)
मोहन मोहिनी आधीन।
रहें अति आसक्त अनुदिन कहा गति जल मीन॥ [1]
नित्य नवतन नेह नेही परस्पर रस-लीन।
हित श्रीहरिप्रिया रसिकन हेत बिबि तन कीन॥ [2]
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (34)
(दोहा)
यह मोहन [कृष्ण] रस के वश होकर सदा मोहिनी जू [राधा] के आधीन रहते हैं। इनका स्नेह नित्य नूतन रहता है। इसके सामने जल और मीन के स्नेह की कोई उपमा युक्तिसंगत नहीं है।
(पद)
ये मोहन सदा मोहनी जी के आधीन रहते हैं। इनकी आसक्ति इतनी प्रबल है कि इनके प्रेम के सामने जल और मीन की उपमा तुच्छ प्रतीत होती है। (मछली जल के वियोग में तो अपने प्राणों को त्याग देती है, परन्तु जल में रहने पर उसका प्रेम जल के प्रति नित्य नहीं बढ़ता है। और दूसरा जैसा मछली का जल के प्रति प्रेम है, वैसा जल का मछली के प्रति नहीं है। अत: दिव्य दंपति को मीन एवं जल की उपमा देना ग़लत है ) [1]
इन दोनों का प्रेम नित्य नूतन है क्योंकि ये सदा परस्पर रस में लीन रहते हैं इसलिये इनका प्रेम क्षण-क्षण में बढ़ता रहता है।
वास्तविक तो श्रीहरि एवं प्रिया का तत्वांश में एक ही स्वरूप है। श्रीहितु सहचरी जी और रसिकों के लिये ही आपने दो स्वरूप धारण कर रखे हैं। [2]

