सुरझाये सुरझे नहीं उरझ रहे यह रूप - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (148)

सुरझाये सुरझे नहीं उरझ रहे यह रूप - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (148)

सुरझाये सुरझे नहीं, उरझ रहे यह रूप ।
अरसि परसि ऐसे मिले, द्वै भे एक सरूप ॥

- श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (148)

दिव्य युगल श्रीराधा-कृष्ण एक-दूसरे की रूप-माधुरी में इस प्रकार गुंथे हुए हैं कि उन्हें पृथक करना असंभव है। उनके स्वरूप परस्पर ऐसे एकाकार हो गए हैं कि दो देह होने पर भी वे एक स्वरूप में परिवर्तित हो गए हैं।