श्याम दृगन की चोट सहे को।
जिन लागी तिनही तन जानी पीर हिय-लगि कासों कहै को ॥ [1]
पल में होत सुजान बावरो विचरत बेकल भौन रहै को।
'ललितविहारिणि' नैन तीर लगि धीर धरै सो बीर अहै को ॥ [2]
- श्री ललित विहारिणी जी
जो जीव श्यामसुंदर के नयनों के कटाक्षों से घायल होता है, उसका हाल केवल उसका ह्रदय ही जानता है । उसकी दशा ऐसी होती है कि वह जीव किसी अन्य से अपने ह्रदय का हाल भी नहीं बता सकता (अर्थात् ऐसे गुप्त प्रेम को वह किसी के सामने प्रकट नहीं कर सकता) । [1]
ऐसा प्रेमी जीव एक पल में ही उस रूप माधुरी में बाँवरा होकर, अपनी सुध बुध खो कर, व्याकुलता पूर्वक विचरण करता है । श्री ललित विहारिणी जी कहते हैं कि इस विश्व में ऐसा बहादुर व्यक्ति कौन है जो श्यामसुंदर के नेत्रों की कटाक्ष से घायल भी हो और धीरज भी रख सके? [2]
जिन लागी तिनही तन जानी पीर हिय-लगि कासों कहै को ॥ [1]
पल में होत सुजान बावरो विचरत बेकल भौन रहै को।
'ललितविहारिणि' नैन तीर लगि धीर धरै सो बीर अहै को ॥ [2]
- श्री ललित विहारिणी जी
जो जीव श्यामसुंदर के नयनों के कटाक्षों से घायल होता है, उसका हाल केवल उसका ह्रदय ही जानता है । उसकी दशा ऐसी होती है कि वह जीव किसी अन्य से अपने ह्रदय का हाल भी नहीं बता सकता (अर्थात् ऐसे गुप्त प्रेम को वह किसी के सामने प्रकट नहीं कर सकता) । [1]
ऐसा प्रेमी जीव एक पल में ही उस रूप माधुरी में बाँवरा होकर, अपनी सुध बुध खो कर, व्याकुलता पूर्वक विचरण करता है । श्री ललित विहारिणी जी कहते हैं कि इस विश्व में ऐसा बहादुर व्यक्ति कौन है जो श्यामसुंदर के नेत्रों की कटाक्ष से घायल भी हो और धीरज भी रख सके? [2]

