सींवा नैंननि तेरे की ।
अव नहिं दृष्टि दुरांउ री प्यारी सखि! सुनु जिय मेरे की ॥ [1]
कमल, मीन, मृग-जूथ भुलाने वर कटच्छ फेरे की ।
‘कुंभनदास' प्रभु गिरिधर रिझवति भ्रुव-विलास घेरे की ॥ [2]
- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (170)
हे प्यारी जू [श्री राधे], तुम्हारे नयन तो अगाध रस एवं सौंदर्य की सीमा हैं ! मेरा ह्रदय यही कहता है कि अब मैं तुम्हारे नयनों से अपनी दृष्टि को नहीं हटाऊँगा । [1]
तुम्हारे नेत्रों की एक कटाक्ष ने ही कमल, मीन एवं मृग (के समूह) के सुंदर नेत्रों आदि को हेय कर दिया है । श्री कुंभनदास जी कहते हैं कि मेरे प्रभु गिरिधर लाल तो इनपर इतने आसक्त चित्त हैं कि तुम्हारे (श्री राधा के) भृकुटियों के इशारे पर ही अपने जीवन को समर्पित किया हुआ है । [2]
अव नहिं दृष्टि दुरांउ री प्यारी सखि! सुनु जिय मेरे की ॥ [1]
कमल, मीन, मृग-जूथ भुलाने वर कटच्छ फेरे की ।
‘कुंभनदास' प्रभु गिरिधर रिझवति भ्रुव-विलास घेरे की ॥ [2]
- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (170)
हे प्यारी जू [श्री राधे], तुम्हारे नयन तो अगाध रस एवं सौंदर्य की सीमा हैं ! मेरा ह्रदय यही कहता है कि अब मैं तुम्हारे नयनों से अपनी दृष्टि को नहीं हटाऊँगा । [1]
तुम्हारे नेत्रों की एक कटाक्ष ने ही कमल, मीन एवं मृग (के समूह) के सुंदर नेत्रों आदि को हेय कर दिया है । श्री कुंभनदास जी कहते हैं कि मेरे प्रभु गिरिधर लाल तो इनपर इतने आसक्त चित्त हैं कि तुम्हारे (श्री राधा के) भृकुटियों के इशारे पर ही अपने जीवन को समर्पित किया हुआ है । [2]

