जप नहीं, तप नहीं, ज्ञान नहीं, ध्यान नहीं - रसिक वाणी

जप नहीं, तप नहीं, ज्ञान नहीं, ध्यान नहीं - रसिक वाणी

(कवित्त)
जप नहीं, तप नहीं, ज्ञान नहीं, ध्यान नहीं,
मेरो एक बल प्रभु! तेरो बस नाम है। [1]
चाहे सारा जग रूठ जाये भी तो रूठ जाय,
मोहि प्रभुवर ! बसु तोहि सो तो काम है॥ [2]
रावरो अनूप रूप, चित्त में समायो है,
भूलि हौं न ताहि, भूलि सारो धन धाम है। [3]
ब्रजके लला ! हे कृष्ण ! त्यागियो न मोहि कभी,
तुम्हरे चरण-पद्म मेरो प्रणाम है॥ [4]

- रसिक वाणी

हे प्रभु, न मेरे पास जप का बल है, न तप, ज्ञान, ध्यान एवं अन्य किसी साधन का। मेरा बल तो केवल आपका नाम है। [1]

चाहे सारा जग क्यों न रूठा करे, मुझे तो बस मेरे प्रभु को ही रिझाना है, उनसे ही बस मुझे काम है। [2]

मेरे प्रभु का अनुपम रूप मेरे चित्त में समाया हुआ है, मुझे उनके रूप को नहीं भूलना है भले ही चाहे सारा धन धाम क्यों न भूला करूँ। [3]

हे ब्रज राज, श्री कृष्ण! मेरी विनती है कि तुम मुझे कभी त्यागना नहीं। तुम्हारे चरणों में मेरा सदा प्रणाम है। [4]