देशकाल नहिँ नियम कछु नहिँ कछु शिष्टाचार - जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (41)

देशकाल नहिँ नियम कछु नहिँ कछु शिष्टाचार - जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (41)

देशकाल नहिँ नियम कछु, नहिँ कछु शिष्टाचार ।
सरल हृदय नहिँ छल कपट, प्रेमपंथ बलिहार ॥

- जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (41)

मैं उस विलक्षण प्रेम-पंथ पर सर्वस्व न्यौछावर करता हूँ, जहाँ देश, काल अथवा बाह्य शिष्टाचार का कोई बंधन नहीं है। यहाँ केवल निष्कपट हृदय से निष्काम प्रेम करना ही सर्वस्व है।