मैं गोबिंद गुण गाणा - श्री मीराबाई

मैं गोबिंद गुण गाणा - श्री मीराबाई

मैं गोबिंद गुण गाणा ।
राजा रूठै नगरी राखै,
हरि रूठ्याँ कहँ जाणा । [1]
राणा भेज्या जहर पियाला,
इमिरत करि पी जाणा ॥ [2]
डबिया में भेज्या ज भुजंगम,
सालिगराम कर जाणा । [3]
मीरा तो अब प्रेम-दिवानी,
साँवलिया बर पाणा ॥ [4]

- श्री मीराबाई

मैं गोविंद के गुण गाऊँगीं । यदि राजा रूठे तो रूठता रहे, अपना साम्राज्य वो अपने पास रखे। परंतु यदि हरि रूठ गये तो मैं कहाँ जाऊँगी ? [1]

जब राणा ने मुझे जहर का प्याला भेजा; मैंने उसे अमृत मान कर ग्रहण कर लिया । [2]

जब राणा ने मुझे एक डिब्बी में साँप भेजे तो मैंने उनमें दिव्य शालिग्राम पाए । [3]

श्री मीरा बाई जी कहती हैं कि वे तो अब अपने प्रियतम साँवरिया [श्री कृष्ण] के प्रेम में दीवानी हैं । [4]