(कवित्त)
कुंदन रतन भूमि, लता तरु रही झूमि,
सरस परस होत जमुना के पानी कौ। [1]
ललित ललित अति छवि पर बलि बलि,
राग रंग अंग-संग सुख रजधानी कौ॥ [2]
प्रकट प्रकास रास केलि कौन कहि सकै,
थकी मति सुरन की, देव बुधि बानी कौ। [3]
वृंदावन धाम अभिराम सदा स्यामास्याम,
महकै सुगंध सौं महल महारानी कौ॥ [4]
- श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त एवं सवैया (28)
प्रिया-प्रियतम की लीला भूमि श्री धाम वृंदावन की तो शोभा ही निराली है। यहाँ का कण-कण सुवर्ण तथा रत्न कणों से भी अधिक बहुमूल्य है तथा यमुना जी का स्पर्श ह्रदय में सरस रस बरसाता है। [1]
इस रजधानी में श्री प्रिया-प्रियतम की मनोहारिणी छवि का दर्शन कर जीव बलिहारी जाता है। उनकी राग-रंग युक्त क्रीडायें मन को मोह लेती हैं। [2]
यहाँ की पावन भूमि पर होने वाली श्री श्यामा-श्याम की अति सुरम्य रास एवं केली की लीलाओं का वर्णन करने में तो देवताओं के समान बुद्धि वालों की वाणियाँ भी थकित रह जाती हैं। [3]
श्री राधा महारानी जू का यह निज महल “श्री धाम वृंदावन", उनकी (श्री श्यामा-श्याम की) पावन सुगंध से सुवासित है। [4]
कुंदन रतन भूमि, लता तरु रही झूमि,
सरस परस होत जमुना के पानी कौ। [1]
ललित ललित अति छवि पर बलि बलि,
राग रंग अंग-संग सुख रजधानी कौ॥ [2]
प्रकट प्रकास रास केलि कौन कहि सकै,
थकी मति सुरन की, देव बुधि बानी कौ। [3]
वृंदावन धाम अभिराम सदा स्यामास्याम,
महकै सुगंध सौं महल महारानी कौ॥ [4]
- श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त एवं सवैया (28)
प्रिया-प्रियतम की लीला भूमि श्री धाम वृंदावन की तो शोभा ही निराली है। यहाँ का कण-कण सुवर्ण तथा रत्न कणों से भी अधिक बहुमूल्य है तथा यमुना जी का स्पर्श ह्रदय में सरस रस बरसाता है। [1]
इस रजधानी में श्री प्रिया-प्रियतम की मनोहारिणी छवि का दर्शन कर जीव बलिहारी जाता है। उनकी राग-रंग युक्त क्रीडायें मन को मोह लेती हैं। [2]
यहाँ की पावन भूमि पर होने वाली श्री श्यामा-श्याम की अति सुरम्य रास एवं केली की लीलाओं का वर्णन करने में तो देवताओं के समान बुद्धि वालों की वाणियाँ भी थकित रह जाती हैं। [3]
श्री राधा महारानी जू का यह निज महल “श्री धाम वृंदावन", उनकी (श्री श्यामा-श्याम की) पावन सुगंध से सुवासित है। [4]

