(राग गौरी - अठताल)
कहा भयौ वृंदावनहि बसै।
जौलगि व्यापत माया तौलगि कह घरतें निकसै ॥ [1]
धन मेवा कौ मंदिर सेवत, करत कोठरी विषे रसै ।
कोटि कोटि दंडवत करै कह, भूमि लिलाट घसै ॥ [2]
मुँह मीठे, मन सीठे कपटी, वचन रचन नैननि विहसै ।
मंत्र ठगोरी कबहूँ न तंत्र गद, मानत विषय डसै ॥ [3]
कंचन हाथ न छुवत कमंड़ल, मै मिलाय विलसै ।
व्यास लोभ रति हरि हरिदासनि, परमारथहि खसै ॥ [4]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (262)
श्री धाम वृंदावन में यदि वास भी मिल गया तो ऐसा क्या हो गया क्योंकि जब तक लोभ एवं पाखंड रूपी माया से वे ग्रसित है तब तक उसने घर को त्याग कर भी ऐसा क्या कमाल कर दिखाया? [1]
स्वयं को मंदिर का सेवक बताकर श्रद्धालु जीवों के धन का अपराहण करते हैं एवं दूसरी ओर अपनी कोठियों आदि में विषय रस का सेवन करते हैं । स्वयं को भक्त दिखलाने के लिए कोटि कोटि बार दण्डवत करके, अपने माथे को भूमि पर रगड़ते हैं । [2]
मुख से मीठी मीठी बातें बनाते हैं परंतु ह्रदय से कपटी हैं । अपने वचनों से, नैनों से एवं मीठी मुस्कान से दूसरों को ठगते हैं । स्वयं तो विषय रस से डसे हुए हैं परंतु दूसरे को मंत्र दीक्षा देकर के ठगते हैं । [3]
ऐसा पाखंड करते हैं कि धन को वे छूते भी नहीं अर्थात् अपने हाथों में न लेकर अपने कमंडल रूपी पात्र में लेते हैं । ऐसे लोभी व्यक्ति जो स्वयं को हरि का दास कहलाते हैं, वे वृंदावन में वास तो करते हैं, परंतु वे परमार्थ से कोसों दूर हैं । [4]
कहा भयौ वृंदावनहि बसै।
जौलगि व्यापत माया तौलगि कह घरतें निकसै ॥ [1]
धन मेवा कौ मंदिर सेवत, करत कोठरी विषे रसै ।
कोटि कोटि दंडवत करै कह, भूमि लिलाट घसै ॥ [2]
मुँह मीठे, मन सीठे कपटी, वचन रचन नैननि विहसै ।
मंत्र ठगोरी कबहूँ न तंत्र गद, मानत विषय डसै ॥ [3]
कंचन हाथ न छुवत कमंड़ल, मै मिलाय विलसै ।
व्यास लोभ रति हरि हरिदासनि, परमारथहि खसै ॥ [4]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (262)
श्री धाम वृंदावन में यदि वास भी मिल गया तो ऐसा क्या हो गया क्योंकि जब तक लोभ एवं पाखंड रूपी माया से वे ग्रसित है तब तक उसने घर को त्याग कर भी ऐसा क्या कमाल कर दिखाया? [1]
स्वयं को मंदिर का सेवक बताकर श्रद्धालु जीवों के धन का अपराहण करते हैं एवं दूसरी ओर अपनी कोठियों आदि में विषय रस का सेवन करते हैं । स्वयं को भक्त दिखलाने के लिए कोटि कोटि बार दण्डवत करके, अपने माथे को भूमि पर रगड़ते हैं । [2]
मुख से मीठी मीठी बातें बनाते हैं परंतु ह्रदय से कपटी हैं । अपने वचनों से, नैनों से एवं मीठी मुस्कान से दूसरों को ठगते हैं । स्वयं तो विषय रस से डसे हुए हैं परंतु दूसरे को मंत्र दीक्षा देकर के ठगते हैं । [3]
ऐसा पाखंड करते हैं कि धन को वे छूते भी नहीं अर्थात् अपने हाथों में न लेकर अपने कमंडल रूपी पात्र में लेते हैं । ऐसे लोभी व्यक्ति जो स्वयं को हरि का दास कहलाते हैं, वे वृंदावन में वास तो करते हैं, परंतु वे परमार्थ से कोसों दूर हैं । [4]

