बहुरि परे वा दिश को पांव - श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (102)

बहुरि परे वा दिश को पांव - श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (102)

बहुरि परे वा दिश को पांव ।
परम मनोहर जमुना तट परि, जा दिशि मेरो गांव ॥ [1]
स्वामी तहाँ हमारे मोहन, स्वामिनी राधा नांव ।
नागर ह्वाँ बहु चरन धारि, उहां पहुँचि पंगु ह्वै जांव ॥ [2]

- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (102)

अब ऐसा कब होगा जब मेरे चरण वृंदावन की ओर चलेंगें । जहां परम मनोहर यमुना का तट है, उसी दिशा में ही मेरा गाँव है । [1]

जहां मोहन [श्री कृष्ण] हमारे स्वामी हैं और श्री राधा हमारी स्वामिनी हैं । श्री नागरीदास जी कहते हैं कि तूने अनादिकाल से अब तक बहुत विचरण कर लिया, अब वृंदावन पहुँच कर पंगु (स्थिर) हो जा । [2]