वृंदावन में प्रेम को राज सदा भरपूर - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री प्रेम मंजरी (8)

वृंदावन में प्रेम को राज सदा भरपूर - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री प्रेम मंजरी (8)

वृंदावन में प्रेम को, राज सदा भरपूर ।
नेम आदि प्रतिकूलकनि, करि डारे तहाँ चूर ॥

- श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री प्रेम मंजरी (8)

परम पावन श्रीधाम वृंदावन में सदैव विशुद्ध और निष्काम प्रेम का ही एकाधिकार रहा है। यहाँ प्रेम-मार्ग में बाधक बनने वाले समस्त शुष्क नियमों और विधि-विधानों का अस्तित्व स्वतः ही समाप्त हो जाता है।