सहचरि करै सोइ मोइ भावै, सहचरि मो मन ढारि ढरत है ।
मोपर ललिता नैंन पुतरिन, मो दृग ललिता रूप धरत है ॥ [1]
मो तन-मन ते सजनी प्यारी, वह जीवनि न्योछारि करत है ।
जैश्री वंशीअलि ह्वै मर्म कौन करि, हँसी जुगल जल लहरि ढरत है ॥ [2]
- श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (28)
प्रिया प्रियतम का विहार सहचरी की इच्छा के अनुकूल ही होता है । जो ललिता जी करती हैं वही प्रिया प्रियतम को भाता है और जो प्रिया प्रियतम की इच्छा होती है वैसी कामना ललिता जी के ह्रदय में उत्पन्न होने लगती हैं । अत: दोनों में सामंजस्य बना रहता है । ललिता जी ही उपासक की पुतली में बैठ कर युगल के ललित रूप का दर्शन करवाती हैं । [1]
श्री प्रिया प्रियतम को श्री ललिता जी प्राणों से भी अधिक प्यारी हैं और ललिता जी उन पर अपने प्राणों का न्यौछवार करती हैं । श्री वंशी अलि जी कहते हैं कि श्री ललिता जी के युगल के प्रति प्रेम के मर्म को कौन जान सकता है जो युगल रस की लहरें बरसाती हैं । [2]
मोपर ललिता नैंन पुतरिन, मो दृग ललिता रूप धरत है ॥ [1]
मो तन-मन ते सजनी प्यारी, वह जीवनि न्योछारि करत है ।
जैश्री वंशीअलि ह्वै मर्म कौन करि, हँसी जुगल जल लहरि ढरत है ॥ [2]
- श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (28)
प्रिया प्रियतम का विहार सहचरी की इच्छा के अनुकूल ही होता है । जो ललिता जी करती हैं वही प्रिया प्रियतम को भाता है और जो प्रिया प्रियतम की इच्छा होती है वैसी कामना ललिता जी के ह्रदय में उत्पन्न होने लगती हैं । अत: दोनों में सामंजस्य बना रहता है । ललिता जी ही उपासक की पुतली में बैठ कर युगल के ललित रूप का दर्शन करवाती हैं । [1]
श्री प्रिया प्रियतम को श्री ललिता जी प्राणों से भी अधिक प्यारी हैं और ललिता जी उन पर अपने प्राणों का न्यौछवार करती हैं । श्री वंशी अलि जी कहते हैं कि श्री ललिता जी के युगल के प्रति प्रेम के मर्म को कौन जान सकता है जो युगल रस की लहरें बरसाती हैं । [2]

