इन नैंनों मधि मोहन सोहन सूरत आनि समानी ।
धरम सरम पथ अब सब भूले भूले नेंम कहानी ॥ [1]
वल्लभ रसिक कोई कुछ भाखो में नेंकु न मन में आनी ।
हिय अटकी लटकी चटकीली पाग जु सुरंग सुहानी ॥ [2]
- श्री वल्लभ रसिक, श्री वल्लभ रसिक जी की वाणी, सदा की माँझ (5)
मेरी आँखों के मध्य में श्रीकृष्ण का मनमोहक रूप समा गया है। धर्म और शिष्टाचार के मार्ग अब सब भूल चुके हैं और समस्त प्रकार के विधि/निषेध फीके पड़ गए हैं । [1]
श्रीवल्लभ रसिक कहते हैं, जिसको जो कहना है वो कहे, मेरे मन पर अब कोई असर नहीं होगा । मेरा मन तो मनमोहन श्री कृष्ण चन्द्र की सुंदर लटकी हुई, चमकीले रंग की पगड़ी पर आकर्षित हो गया है। [2]
धरम सरम पथ अब सब भूले भूले नेंम कहानी ॥ [1]
वल्लभ रसिक कोई कुछ भाखो में नेंकु न मन में आनी ।
हिय अटकी लटकी चटकीली पाग जु सुरंग सुहानी ॥ [2]
- श्री वल्लभ रसिक, श्री वल्लभ रसिक जी की वाणी, सदा की माँझ (5)
मेरी आँखों के मध्य में श्रीकृष्ण का मनमोहक रूप समा गया है। धर्म और शिष्टाचार के मार्ग अब सब भूल चुके हैं और समस्त प्रकार के विधि/निषेध फीके पड़ गए हैं । [1]
श्रीवल्लभ रसिक कहते हैं, जिसको जो कहना है वो कहे, मेरे मन पर अब कोई असर नहीं होगा । मेरा मन तो मनमोहन श्री कृष्ण चन्द्र की सुंदर लटकी हुई, चमकीले रंग की पगड़ी पर आकर्षित हो गया है। [2]

