तेरी मैं अधिक चतुराई जानी - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (197)

तेरी मैं अधिक चतुराई जानी - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (197)

(राग कानरौ)
तेरी मैं अधिक चतुराई जानी ।
गिरिधर पिय तन भौंह कमानें, नैंन अनंग सर तानी ॥ [1]
या त्रिभुवन में तुही है लडैती, सकल जुवति-सिर-रानी ।
'कृष्णदास’ प्रभु गिरिधर पिय के, तन मन प्रान समानी ॥ [2]

- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (197)

हे प्यारी जू [श्री राधे], तुम्हारी चतुराई मैंने भली प्रकार से जान ली है । अपनी बौंहों के धनुष से नयनों के बाण चलाकर अपने प्रियतम गिरिधर लाल को तुमने अपने अनुराग रंग में रंगकर घायल कर दिया है । [1]

हे लड़ैती! इस त्रिभुवन में केवल एक तू ही तो ऐसी है जो समस्त युवतियों की चूड़ामणि रानी है । श्री कृष्ण दास जी कहते हैं कि मेरे प्रभु गिरिधर लाल तुम्हारे चरणों पर अपने तन, मन, एवं प्राणों को सदा नयौछावर करते हैं । [2]