श्री गुणमंजरीदास (श्री गल्लू गोस्वामी) जी की जीवनी

श्री गुणमंजरीदास (श्री गल्लू गोस्वामी) जी की जीवनी

जन्म :
माध्वगौड़ेश्वराचार्य परम सन्त पूज्य पाद गोस्वामी श्री गल्लू जी महाराज के पिता का नाम श्रीरमण दयालजी महाराज था । श्री गल्लू जी महाराज का जन्म ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी सन् 1827 में हुआ था । इनके एकमात्र पुत्र श्रीराधाचरण गोस्वामी जी हुये । श्रीराधाचरण जी की माँ का नाम श्रीमती सूर्यादेवी गोस्वामी था ।

बाल्यकाल :
श्री रमणदयाल गोस्वामी जी अधिकतर फरुखाबाद में रहते थे । वहीं श्री गल्लू जी महाराज का विद्याध्ययन हुआ । श्रीगल्लूजी महाराज बचपन से संत प्रकृति, भक्त प्रवृत्ति के महान त्यागी सन्त थे । प्रारम्भ से ही उनके नाम के आगे महात्मा शब्द लग गया । सभी उन्हें महात्मा जी से सम्बोधित करते थे । अल्प भोजन करने वाले थे, दिन भर में मात्र एक फुल्का और साग पाते थे । मात्र शरीर निर्वाह हेतु, स्वभाव में अति सरल उदार तथा विनम्र थे । उनके जीवन के दो ही लक्ष्य थे । प्रथम आत्म चिन्तन, द्वितीय श्रीराधारमण देव की उपासना । इन दोनों कार्यों में वह प्रतिपल विभोर रहते थे ।
 
पर दुर्भाग्यवश उनका अपना संसार भगवत्सेवाके बहुत अनुकूल न था । उनके पिताजी की आर्थिक स्थिति अच्छी न थी । उनपर वृन्दावन में बहुत-सा कर्ज हो गया था । इसीलिए वे वृन्दावन छोड़कर फर्रुखाबाद रहने लगे थे । गल्लूजी के भक्ति भाव में इससे अधिक प्रतिकूलता और क्या हो सकती थी कि उन्हें पिताके ऋणके कारण अपने इष्टके धाम से बाहर रहना पड़े । उन्होंने इस प्रतिकूलता को दूर करने का सङ्कल्प किया । पर यह कार्य आसान तो था नहीं । उनकी उम्र अभी नौकरी या व्यवसायके लायक तो थी नहीं, जो वे ऐसा कुछ कर पिताजी का ऋण चुका सकते । फिर नौकरी या व्यवसाय उनके स्वभाव के अनुकूल भी कब था ? वे एक ही कार्य कर सकते थे । वह था हरि कथा कीर्तन। इसलिए उन्होंने कथा कहना आरम्भ किया । पहली कथा उन्होंने 10 वर्षकी उम्र में कही लखनऊ में शाह बिहारीलाल जी के घर । श्री गल्लू जी के पुत्र, प्रसिद्ध साहित्यकार श्रीराधाचरण गोस्वामी ने लिखा है कि उस कथामे Rs. 500 की भेट चढ़ी, जो उस समयके लिए एक बहुत बड़ी रकम थी । उससे ऋणका कुछ अंश चुका दिया गया ।

अल्पावस्था में ही एक सच्चे भक्त और सुनिपुण कथावाचक के रूपमें उभरते हुए गल्लुजी ने भक्तजनों के हृदय में अपना विशिष्ट स्थान बना लिया । यह देख उनके ही कुटुम्ब के एक व्यक्तिको उनसे ईर्ष्या होने लगी । उन्होंने गल्लुजी को विष दे दिया । उस समय गल्लुजी की अवस्था 16 वर्ष की थी । विषका पता चल गया। उसके निवारणका शीघ्र उपाय किया गया और उनके प्राणकी रक्षा हो गयी । परिवार के लोगोंने विष खिलानेवाले व्यक्ति की पुलिस में रिपोर्ट करना चाहा । पर गल्लूजी का हृदय इसे गंवारा न कर सका । उन्होंने बहुत अनुनय-विनयकर उन्हें उनके विरुद्ध कोई कार्यवाही न करने को राजी किया। इसके पश्चात् वे जन्म भर उनका यथोचित सत्कार करते रहे।

विवाह :
गल्लूजी का विवाह उनके पिताजी ने 1844 में कर दिया, जब उनकी अवस्था केवल 17 सालकी थी । विवाह के कुछ ही दिन बाद उनकी पत्नीका देहान्त हो गया । पिताजी ने दूसरा विवाह फर्रुखाबाद की ही एक कन्या से कर देना चाहा । गल्लूजी दूसरे विवाह के पक्षमें न थे । जब पिताजी ने आग्रह किया तो वे बोले -'यदि मेरा वास्तविक कल्याण चाहते हैं, तो दोबारा गार्हस्थ्य की बेड़ियाँ न पहनाइये । यदि पहनानी ही हों, तो लोहे की क्यों, सोने की पहनाइये । विवाह सम्बन्ध फर्रुखाबादमें न कर वृन्दावन की किसी लड़की से कीजिये, जिससे कम-से-कम उसके सम्बन्ध से वृन्दावन जाना-आना होता रहे ।' पिता ने उनकी बात मान ली । विवाह वृन्दावन में श्री जगन्नाथ मिश्र की कन्या श्रीसूर्यादेवी से कर दिया ।

वृन्दावन आगमन :
गल्लूजी ने धीरे-धीरे कथाओं में प्राप्त भेंटके माध्यम से पिताजी का सारा ऋण चुका दिया । पिता-पुत्र के वृन्दावन जाने का मार्ग अब प्रशस्त हो गया । दोनों वृन्दावन जाकर रहने लगे ।
वृन्दावन जाते समय रास्ते में लुटेरे गाड़ी में घुस आये । गल्लूजी का एक बक्सा, जिसमें बहुमूल्य ग्रन्थ थे, लेकर जाने लगे । उन्होंने कहा- 'भइया, इसमें केवल पुस्तकें हैं । यह तुम्हारे काम की नहीं हैं । इन्हें छोड़ जाओ और जो चाहो सो ले जाओ ।' लुटेरे पुस्तकें छोड़ गये, बाकी सारा सामान ले गये ।

ब्रज भाषा से प्रेम :
अन्तिम क्षण तक गल्लूजी ने बृज भाषा को अपनाया । उनके मुख से स्वाभाविक रूप से बृज भाषा ही निकलती थी । इन्होंने पूर्ण जीवन पर्यन्त किसी अन्य भाषा के शब्द का उच्चारण नहीं किया ।
भाषा के सम्बन्ध में श्री गल्लू जी महाराज के जीवन का एक संस्मरण बहुत प्रसिद्ध है । लखनऊ के शाहजी श्रीकुन्दन लाल शाह (ललित किशोरी) श्रीफुन्दन लाल शाह जी (श्री ललित माधुरी) श्री महाराज को देवतुल्य मानते थे । वह कहते थे "गुरु गल्लू जी महाराज का दर्शन कर श्रीराधारमण देव का सहज स्मरण हो आता है बहुत शान्ति मिलती है" (यह वाक्य श्रीराधाचरण गोस्वामी जी की डायरी से उद्धृत किया है)।

शाहजी साहिब के यहाँ बन्दूक चलवाने की आज्ञा श्रीगल्लूजी महाराज ने दी । यह आज्ञा प्राप्त करने लखनऊ निवासी शाहजी बहुत से व्यक्तियों के साथ श्रीमहाराज के दर्शन करने स्वयं आये तब बहुतों के मन में कौतूहल था कि श्रीमहाराज बृजभाषा के अतिरिक्त कोई शब्द प्रयोग करते नहीं है तो बन्दूक, बारूद भरकर चलाने की आज्ञा किस प्रकार देंगे । जब शाहजी साहिब ने जिज्ञासा प्रगट की तो श्रीमहाराज सहज रूप से बोले - "लोह नलिका में (बन्दूक) श्याम चूर्ण (बारूद) भरयौ अग्नि जो दीनी तौ भड़ाम शब्द होये (भयौ)” सभी गद् गद् हो गये । सभी ने गल्लूजी महाराज की चरण रज धारण की । इस वाक्य में बृज भाषा के शब्द का रूप तथा ध्वनि नाद कितना आकर्षण पूर्ण है।

दिनचर्या एवं रहनी :
श्रीगल्लू जी महाराज का सम्पूर्ण समय 1. बृजवासियों की सेवा, 2. दीन-दुखियों की सेवा तथा 3. गऊ सेवा में व्यतीत
होता था । वह कोई भी वस्तु द्रव्य संचय नहीं करते थे । सब वस्तुओं को दे देते थे । उदार प्रकृति के कारण वह लोक व्यवहार अर्थात् संसार के व्यवहार में शून्य थे । आठों पहर वह सेवा भाव में डूबे रहते थे तथा चौबीसों घण्टे भजन तथा अपने श्रीराधारमण देव की उपासना में विभोर रहते थे । उस समय के सन्तों की भक्तों की दृढ़ मान्यता थी कि गुरु गल्लू जी महाराज को श्रीराधारमण देव का प्रत्यक्ष दर्शन वार्तालाप प्राप्त होता है ।

निर्लोभता :
काशी, शाहजहाँपुर और भरतपुर आदि शहरोंमें भी उनकी श्रीमद्भागवत की कथाएँ होती रहतीं । भरतपुरके सरकारी मन्दिरों में जब वे कथा कहने जाते, तो बाजार में उनकी सवारी निकलती । दोनों ओरसे दण्डवत् और जय-जयकार की ध्वनिके कारण सवारीका निकलना मुश्किल हो जाता ।
कथाओं में भेंट में प्राप्त किया हुआ धन गल्लूजी सब खर्च कर देते । खर्च भी अपने या अपने परिवार के ऊपर नहीं, साधु- वैष्णवों और ब्रजवासियों के ऊपर । ब्रजवासियोंसे, और विशेषरूपमे नन्दग्राम और बरसाना के ब्रजवासियोंसे उन्हें विशेष प्रेम था । उनके घर दस-पांच ब्रजवासी अतिथि रूपमें बने ही रहते । श्रीराधाचरण गोस्वामीजी ने लिखा है कि उन्होंने कम-से-कम एक लाख रुपया उपार्जन किया, और सब भगवत् सेवा और परमार्थ में खर्च कर दिया । उनके अपने घरका खर्च तो बहुत ही कम था । उनकी धारणा थी कि उन्हें जो धन भगवत् कथासे प्राप्त होता है, वह भगवत् सेवा और साधु- वैष्णव-सेवामें ही लगना चाहिये । अपने उपयोगमें उतना ही आना चाहिये, जितना शरीर धारण करने के लिए आवश्यक हो ।

श्री राधारमण जी द्वारा गुणमंजरी नाम प्रदान करना :
श्रीगल्लू जी महाराज का कवि के रूप में नाम गुणमंजरी है । यद्यपि यह नाम श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी जी महाराज का है । शास्त्रों के अनुसार विचारणीय बात यह है कि श्रीगल्लू जी को यह मंजरी नाम कैसे प्राप्त हो गया ?
श्रीगल्लू जी महाराज ने गुरु परम्पराष्टक माला, श्रीगोपाल भट्ट शतक, श्रीभागवत पदावली आदि पुस्तकों की रचना की । जब वह राधारमण पदावली लिख रहे थे जिसमें साल के उत्सव तथा दैनिक सेवा पदावली है । श्रीराधारमण देव ने स्वप्न में आकर कहा, “तू गुणमंजरी है" (श्रीराधाचरण जी की डायरी से उद्धृत) "सब पदन के छोर में लगा तब मौये स्वीकृत होयगौ" । स्वप्न में श्रीराधारमण देव ने इस प्रकार कहा ।
तभी उनकी रचनाओं में प्रत्येक अन्तिम पंक्ति गुणमंजरी के नाम से है । श्रीगल्लूजी महाराज भाव में डूबे रहते, रोते रहते एवं अपने इष्ट प्राणधन श्रीराधारमण देव के पदों की रचना करते रहते थे । ये माध्वगौड़ेश्वर सम्प्रदाय के परम दिव्य सन्त माने जाने लगे ।

श्री राधारमण जी के मंगला आरती से प्रेम :
श्रीगल्लूजी महाराज सदैव मंगला आरती, सेवा करते थे । किसी भी गोस्वामी की सेवा हो वह सेवा वालों के द्वार पर पहुँच कर आग्रह, प्रार्थना करते थे कि मंगला की सेवा की अनुमति मुझे दो । अधिकांश गोस्वामी उनका सहयोग करते कुछ ऐसे भी अभिमानी गोस्वामी थे जो उनकी विनती स्वीकार नहीं करते उन्हें दुतकार देते, किन्हीं सज्जन ने तो उन पर हाथ तक उठाया । जब वह भोर की सेवा में नहीं जाते तो बाहर मन्दिर की सोहनी सेवा करते थे । लोग उनसे पूछते थे महाराज आज आप मन्दिर नहीं गये तो रोकर कहते "मोते कछु अपराध है गयौ है तौ राधारमण ने नहीं बुलायौ" । जिन स्वरूपों ने उन्हें मारा उनका वंश वर्तमान में नहीं है । उनका सेवा-भाव एवं विनम्रता एक उदाहरण है ।

श्री राधारमण जी के प्रसाद से प्रेम :
श्रीराधारमण के राजभोग के पश्चात् वे सेवाइत से राधारमणजी की एक प्रसादी रोटीकी भिक्षा मांग लिया करते । यह भी उनका दैनिक नियम था । एक बार एक कर्कश स्वभावके गोस्वामीने उन्हें फटकारते हुए कहा- 'रोज-रोज आ जाता है रोटी माँगने । तुझे लज्जा नहीं आती, जा रोटी नहीं मिलेगी ।' गल्लूजी ने इसका बुरा न मानकर गोस्वामीजी से कुछ नहीं कहा । उनकी दृष्टिमें गोस्वामीजी का दोष ही क्या था ? रोटी देना, न देना तो राधारमणजी की अपनी इच्छापर निर्भर करता था । सेवाइतको इतनी स्वतन्त्रता कहाँ, जो उनकी इच्छा के विरुद्ध उनके प्रसादकी एक कणिका भी किसीको दे सके ? इसलिए जब भी उन्हें प्रसादी रोटी न मिलती उनका कहना-सुनना, अभ्यर्थना और अभियोग, जो कुछ होता राधारमण के प्रति ही होता । वे उनसे कहते हुए चले जाते - 'मैं तो तुम्हारो टहलुआ हूँ ।
मांगबो टहलुआको काम, देनो तुम्हारो । देओ, न देओ-तुम्हारी मरजी ।'
राधारमणजी भी, यदि गल्लूजीकी सेवामें कभी कोई त्रुटि हो जाती, तो स्वप्न में उनसे शिकायत किये बिना न रहते ।

श्री राधारमण जी के कष्ट की अनुभूति :
किसी गोस्वामी स्वरूप से भूल हो गई । ठाकुरजी के सिरहाने करुआ में जल भरना भूल गये । श्रीगल्लू जी महाराज ने रात्रि एक बजे हल्ला मचाया कि "गर्भ द्वार खोलौ, मेरौ राधारमण प्यासौ है” सभी गोस्वामी स्वरूप उन पर नाराज हुये कि रात में भी चैन नहीं है । वह रोते रहे, आग्रह करते रहे । अन्त में रात्रि 1.30 बजे सभी गोस्वामी स्वरूपों की उपस्थिति में मन्दिर खोला गया । श्री गल्लूजी महाराज तथा सेवा वाला साथ गये तो देखा करुआ खाली है, जल नहीं है । सभी के नेत्रों से अश्रुपात होने लगा ।

सर्प प्रसंग :
एक बार किसी गोस्वामी स्वरूप से सेवा सम्बन्धी अपराध हो गया । उन्होंने जैसे ही मन्दिर का गर्भ द्वार खोला तभी द्वार पर काला सर्प खड़ा मिला । बहुत उपाय करने पर भी द्वार से नहीं हटा तो बड़ी समस्या हो गई कि आखिर मन्दिर कैसे खुले ? उस समय श्री गल्लूजी महाराज ही स्नान करके आये । उनके आते ही सर्प चला गया, शान्ति से सेवा पूजा सम्पन्न हुई ।

वाराणसी यात्रा एवं श्री राधारमण जी द्वारा सलाह देना :
एक बार बहुत आग्रह पर जीवन में एक ही बार श्रीमहाराज वाराणसी गये । यहाँ उनका बहुत ही भव्य दिव्य स्वागत हुआ । वाराणसी के प्रकाण्ड विद्वान उनसे शास्त्रार्थ का आग्रह करने लगे । अपने अभिमान को उन पर थोपने लगे । वह भक्त हृदय थे न कि तार्किक पण्डित । जब वह बहुत दुःखी हुए तब उनके प्रभु श्री राधारमण देव ने स्वप्न में प्रगट हो आदेश दिया । धैर्य दिया तथा मात्र एक प्रश्न का उत्तर देने की सलाह दी । दूसरे दिन भोर में सभी विद्वानों ने उन्हें घेर लिया । श्रीगुरु गल्लूजी महाराज बोले "मात्र एक प्रश्न आप पूछें" तो सब पण्डितों ने कहा "गृहस्थ का क्या धर्म है ?" उत्तर दिया "केवल हरि भजन एवं प्रभु की खोज करना ही धर्म है" और यह कह आंखों में आंसू भर सब विद्वत् जनों के चरणों में लेट गये । इस महान सन्त की विनम्रता देख तथा अमानी भाव देख सभी दंग रह गये । सभी विद्वत् जन एक स्वर से कह रहे थे महात्मा है, अमानी है, सरलता की मूर्ति है, त्याग की मूर्ति है आदि । सभी विद्वत् मण्डली ने श्रीमहाराज की सराहना की तथा शत्-शत् प्रणाम किया ।

ब्रज के सिद्ध संतों का मत :
बृज के सिद्ध बाबा जय कृष्णदास (कामवन वाले) बाबा के पास कृष्णा बंगाली रहता था । वह अपने उद्धार का साधन सदैव पूछा करता था । एक दिन वह बाबा की चरण सेवा कर रहा था तो अचानक बाबा बोले "कृष्ण, इस समय ब्रज में राधारमणीय गोस्वामी सन्त शिरोमणि श्रीगल्लू जी महाराज हैं । अगर तू अपना कल्याण चाहता है, अपना उद्धार करना चाहता है तो जा उस सन्त का सानिध्य प्राप्त कर उनकी सेवा कर, उन्हीं की सेवा से तुझ पर भगवत कृपा होगी ।" कामवन वाले बाबा की आज्ञानुसार वह श्रीगल्लू जी महाराज का कृपा पात्र बन गया । उसने श्री गल्लू जी महाराज की अन्त तक सेवा की । जब श्री महाराज का नश्वर शरीर शान्त हो गया, कहते हैं श्रीमहाराज की उठावनी तक लोगों ने उसको देखा । फिर किसी ने नहीं देखा । कहा जाता है महाराज के जाने के तीसरे दिन श्रीयमुना किनारे उसका शरीर शान्त हो गया । लोगों ने जब मृतक के शान्त चेहरे का दर्शन किया तो सभी ने कहा इसके लिये वैकुण्ठ के द्वार स्वयं खुल गये । सिद्ध बाब जयकृष्ण दास जी ने जब यह घटना सुनी तो बाबा के नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी । लोगों से बाबा ने यही कहा "सन्त और प्रभु बड़े कृपालु होते हैं ।"
कामवन वाले बाबा का नाम राधारमण व्रतोत्सव में उत्सव हेतु आज तक छपता है ।

श्री ललित किशोरी जी का श्री गल्लू गोस्वामी जी से प्रेम :
श्रीललित किशोरी जी ने 'अभिलाष माधुरी' में अपने एक पदमें गोस्वामी श्रीगल्लूजी-सी रति-मति प्राप्त करने की अभिलाषा व्यक्त की है -

कबहुँक ऐसी बननि बनैगी ।
गोस्वामी श्रीगल्लूजी-सी मेरी, मति रति रूप सनैगी ॥

वृन्दावन आनेके बाद गल्लूजी का बाहर जाकर कथा कहनेका क्रम कुछ दिन जारी रहा । वे लखनऊ अकसर जाया करते । लखनऊ के शाह कुन्दनलाल ( श्रीललित किशोरी जी ) और शाह फुन्दनलाल ( श्रीललित- माधुरी जी ) उनमें गुरुबुद्धि रखते । उन्हें वे हरि कथा सुनाते और उपासना सम्बन्धी उपदेश देते । उनके वहां पधारनेपर उनमें जो हर्ष और उल्लासकी लहर दौड़ जाती उसका संकेत ललितकिशोरीजी की एक रचना से मिलता है, जिसकी प्रारम्भिक पंक्तियाँ इस प्रकार हैं -

गोस्वामी आज यहाँ गल्लूजी आये हैं,
वाहवा है, अजी वाहवा है ।
स्वामिनी कृपासे भये मेरे मन भाये हैं,
वाहवा है, अजी वाहवा है ॥

श्री राधारमण जी की सेवा पद्धति का निर्माण :
श्री गल्लू जी महाराज श्रीराधारमण मन्दिर में सब पद- गान, उत्सव गान आदि स्वयं जाकर करते थे । श्रीराधारमण जी का जन्मोत्सव बधाई गान, होली गान आदि बहुत ही विभोर होकर स्वयं गाते थे । वह चाहते थे कि जीवन का हर पल राधारमण की सेवा में व्यतीत हो ।
श्रीराधारमण जी की दैनिक - सालाना सेवा पद्धति नियमावली श्री गल्लू जी महाराज ने ही बनाई जो रजिस्टर में सुन्दर अक्षरों में उतरवाकर गर्भ मन्दिर में आज भी मौजूद है । सभी गोस्वामी स्वरूप आज भी उस का उपयोग कर रहे हैं । आवश्यकता पड़ने पर प्रत्येक सेवा वाला उत्सव आदि में उसका प्रयोग करता है ।

श्री गल्लू जी महाराज की रहस्यात्मक भविष्यवाणी :
जब श्री गल्लू जी महाराज वाराणसी गये तो वहाँ उनका भव्य स्वागत हुआ । हाथी पर इनकी सवारी निकाली । अपना सम्मान होता देख वह बहुत रोये क्योंकि प्रकृति से वह अमानी थे । सात दिन भागवत प्रवचन तथा पद गान किया । उस समय एक घड़ा भर कर चाँदी के रुपये भेंट किये गए । जब वह वृन्दावन चले तो शाह परिवार माधौजी खानदान एवं वीसूजी खानदान के परिवार को बुलाकर रुपयों से भरा घड़ा वहीं छोड़ दिया । सभी शिष्य ले जाने के वास्ते आग्रह करने लगे किन्तु वह धन वृन्दावन नहीं लाये और कहा इस धन का उपयोग भविष्य में वृन्दावन में ही होगा । इसे आप यहीं जमा कर लें । शेरवाली कोठी, ढठेरी बाजार, वाराणसी में यह पैसा जमा रहा । सभी शिष्यों के विशेष आग्रह को स्वीकार कर एक रुपया वृन्दावन ले आये सो स्टेशन पर एक बृजवासी मिल गया तो उसे दे दिया । घर षड्भुज महाप्रभु मन्दिर से खाली हाथ गये और खाली हाथ लौटकर आये । कहा जाता है कि महाराज की मृत्यु के बाद जब उनके पुत्र श्रीराधाचरण गोस्वामी विद्या वागीश जी के दो जवान पुत्रों श्रीनिताई चरण गोस्वामी एवं श्रीगौर चरण गोस्वामी का देहावसान हो गया उस समय श्री राधाचरण गोस्वामी जी के एक मात्र पौत्र ढाई वर्ष के श्रीअद्वैत चरण गोस्वामी परिवार में बचे । तब अपने मरने से पूर्व श्रीराधाचरण गोस्वामी जी ने एक कमेटी का निर्माण किया तथा अपनी वसीयत में लिखा कि जब तक यह बालक बड़ा न हो जाये इस घर का खर्चा तथा ठाकुर षड्भुज महाप्रभु जी के भोग-राग का व्यय वाराणसी की जमा राशि से वाराणसी के शिष्य करेंगे । समय-समय पर वृन्दावन आयेंगे ।
श्री गल्लू जी महाराज की भविष्यवाणी की यह रुपया वृन्दावन में ही व्यय होगा सत्य हुई । यह रहस्य श्रीगोस्वामी राधाचरण जी महाराज द्वारा स्वीकृत किया गया एवं उजागर किया गया । श्रीगुरु गल्लू जी महाराज महान त्यागी, दिव्य-सन्त एवं श्रीराधाचरण देव के परम उपासक थे ।

ठाकुर षड्भुज महाप्रभु की स्थापना :
गौर सेवा, ब्रजवासी-वैष्णव सेवा, दीन-दुखियों की सेवा, इन तीनों कार्यों में मस्त रहकर सन्त गल्लूजी महाराज अपना समय व्यतीत करते थे । इन्होंने भरतपुर, शाहजहाँपुर, बदायूँ, फर्रुखाबाद जाबवट आदि में मन्दिरों की स्थापना की । उसी के साथ अपने निवास स्थान पर 1875 में ठाकुर षड्भुज महाप्रभु की स्थापना की तथा उन्हें अपने घर लाये ।
यह प्राचीन विग्रह ढाका से आयी थी । एक बंगाली स्त्री इस विग्रह की एक छोटी सी कोठरी में रहकर सेवा करती थी । वह श्रीमहाराज की शिष्या व अनन्य भक्त थी । वो ही इस विग्रह को श्रीमहाराज को सौंप कर परलोक सिधार गई । तभी से षड्भुज महाप्रभु के इस सुन्दर विग्रह की पूजा लगातार आज तक होती चली आ रही हैं । अब छठवीं पीढ़ी षड्भुज महाप्रभु की सेवा कर रही हैं । तीन हाथ की कोठरी 6 हाथ के ठाकुर के नाम से पहले ही यह विग्रह प्रसिद्ध है ।

रचना :
श्री गल्लू गोस्वामी जी ने श्री राधारमण जी के अष्टयाम सेवा, जन्मोत्सव एवं बधाई, सांझी, हिंडोल, फूल बांग्ला आदि अनेक पदों की रचना की है जो  'श्रीराधारमण-पदमञ्जरी' और 'श्रीयुगल छद्म' नामक ग्रन्थ में संकलित है । इनके हर पद की अंतिम पंक्ति में "गुणमंजरी" की छाप है । आज भी श्रीराधारमणके मन्दिर में विभिन्न तिथियोंपर 'श्रीराधारमण-पदमञ्जरी' के ही पद गाये जाते हैं ।

श्री गल्लू गोस्वामी जी द्वारा रचित कुछ पद :

श्री राधा रमण की रूप माधुरी के पद:

श्रीराधारमण सिर मुकुट सोहे ।
मोर चन्द्रिकन को चित चोरे जो जोहै सो मोहे ॥
प्रिया ओर झुक रहयौ प्रणय बस बरणि सकै सो को है ।
गुण मंजरी छटा निरखत ही रति पति गर्व खसौ है ॥

भावार्थ: श्रीराधारमण जी के सिर पर सुन्दर मुकुट सुशोभित है जो मोर चन्द्रिका के चित्त को चुरानेवाला है । श्री कृष्ण का मुकुट श्री राधा की ओर झुका हुआ है जिसकी छवि का दर्शन कर रति पति का गर्व खंडित हो गया है । 

मेरे परत हिये में लीकें ।
श्रीराधारमण लालजी की सखि रूप माधुरी पीकें ॥
अंग-अंग छवि कही न जाई श्रीवृषभानु लली के ।
छकी रहों निस वासर हो संग गुण मंजरी अली के ॥

भावार्थ: मेरे ह्रदय में श्री राधारमण लाल जी एवं श्री राधा की रूप माधुरी की झलक दिखलाई पड़ती है, यह मैं प्रतिज्ञा से कहता हूँ । श्री राधा के अंग-अंग की छवि कहते नहीं बनती, जिनके संग गुण मंजरी सखी दिन-रात प्रेम में छकी रहती है । 

श्री राधारमण सलौने श्याम ।
नवल किशोर माधुरी मूरति, अंग अंग अभिराम ॥ 
श्री वृषभान किशोरी गोरी शोभित सुंदर वाम ।
वृंदाविपिन विलासी रस निधि ‘गुणमंजरी’ सुखधाम ॥

भावार्थ:  श्री राधारमण लावण्यमय श्यामवर्ण के हैं जिनकी रूप माधुरी नित्य ही नयी नयी रहती है, जो सदा किशोर अवस्था वाले हैं और जिनका अंग अंग मन को मोहने वाला है । जिनके वाम अंग में सदा सुंदर वृषभानु किशोरी श्री राधा विराजती हैं । श्री गुणमंज़री दास जी कहते हैं कि श्री राधारमण लाल श्री वृंदावन में विलास करते हैं, रस की निधि हैं एवं समस्त सुखों के धाम हैं । 

श्रीराधारमण लाल कछु दीजे ।
अपनी प्राणप्रिया परिकर की दासीगणना कीजै ॥ 
और कछू नहीं चाहों चित में यह बिनती सुनि लीजे ।
श्रीगुणमंजरी के ताते हृदय प्रेम में भीजै ॥ 

भावार्थ: हे श्री राधारमण लाल, यदि आप मुझे कुछ देना चाहते हैं, तो कृपया मुझे अपनी प्राण प्रिया (श्री राधा) के परिकर की दासी बना दीजिए । मैं और कुछ नहीं चाहता, इसलिए मेरे हृदय की इस प्रार्थना को सुन लीजिए । श्री गुणमंजरी दास जी कहते हैं कि श्री प्रिया जी के भक्तों की कृपा से मेरा हृदय आपके विशुद्ध प्रेम में भींजता रहे । 

श्री राधा नाम महिमा का पद:

हमारे धन स्यामाजू कौ नाम ।
जाकौं रटत निरंतर मोहन, नंदनंदन घनस्याम ॥ 
प्रतिदिन नव-नव महामाधुरी, बरसति आठौ जाम।
'गुनमंजरि' नवकुंज मिलावै, श्रीबृन्दावन धाम ॥

भावार्थ: हमारा धन एकमात्र श्री श्यामा [श्री राधे] ज़ू का नाम है जिसे नित्य निरंतर श्री नंद नंदन घनश्याम [श्री कृष्ण] रटते हैं । श्री गुणमंजरी कहती हैं कि श्री राधा नाम की कृपा से नव निकुंज श्री वृंदावन का वास सम्भव होता है जहां प्रतिदिन आठों याम नव नव महा माधुरी बरसती रहती है । 

लीला संवरण :
श्रीराधारमणकी मङ्गला आरतीका उनका नियम पूर्ववत् चलता रहा । वे राधारमणकी मङ्गला आरती के पश्चात् महाप्रभुकी आरती करते । दोनों ठाकुरों में उनकी प्रीति क्रमशः बढ़ती गयी । अब उनकी सेवा छोड़कर उन्हें और कुछ अच्छा न लगता । उनकी सेवा छोड़ वृन्दावन से एक दिनके लिए भी बाहर जाना उन्हें कष्ट कर प्रतीत होता । 1880 में उन्होंने वृन्दावन से कहीं भी बाहर न जानेका संकल्प किया । घर का सारा भार श्री राधाचरण गोस्वामी पर छोड़, स्वयं आठों प्रहर श्रीराधारमण और श्रीमन्महाप्रभुकी सेवा में लवलीन रहने लगे । प्रथम कृष्णा मार्ग शीर्ष 1890 को श्रीराधारमणजी ने सदा के लिए उन्हें अपने नित्य-धाम में अपनी नित्य-सेवा में अंगीकार किया ।