राधा चरन की हूँ शरन - श्री जुगलप्रिया जी

राधा चरन की हूँ शरन - श्री जुगलप्रिया जी

(राग तिलंग, ताल रूपक)
राधा चरन की हूँ शरन ।
कमल पद के आसरे, नित रहत राधारमन ॥ [1]
काम दुख सन्ताप भंजन, बिरह सागर तरन।
ललित कोमल सुभग शीतल, हरत जिय की जरन ॥ [2]
जयति जय नव नागरी पद, सकल भव भय हरन ।
'जुगल प्रिया' नैन निरमल, होत लख नख किरन ॥ [3]

- श्री जुगलप्रिया जी

मैं श्री राधा के चरण कमलों की ही अनन्य शरण लेता हूँ, जिन श्री चरणों के आसरे श्री राधारमण लाल [कृष्ण] भी नित्य रहते हैं । [1]

श्री राधा के चरण-कमल कामनाओं एवं दुखों के संताप का हरण करते हैं एवं विरह सागर से जीव को निकाल सुख समुद्र में डुबा देते हैं । श्री राधा के चरण सुंदर, कोमल, शुभ, एवं शीतल हैं जो हृदय की समस्त जलन को हर लेते हैं । [2]

नवनागरी श्री राधा के चरणों की जय हो, जय हो, जो समस्त प्रकार के भवसागर जनित भयों का हरण करते हैं । श्री जुगल प्रिया जी कहती हैं, श्री राधा के चरणों की नख किरण के दर्शन कर उनके नैन निर्मल होते हैं । [3]