इदमानंदकंदाख्यं विद्धि वृंदावनं मम । यस्मिन्प्रवेशमात्रेण न पुनः संसृतिं विशेत् ॥७६॥
मद्वनं प्राप्य यो मूढः पुनरन्यत्र गच्छति । स आत्महा भवेदेव सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥ ७७॥
वृंदावनं परित्यज्य नैव गच्छाम्यहं क्वचित् । निवसाम्यनया सार्द्धमहमत्रैव सर्वदा ॥७८॥
- पद्मपुराण, खण्डः 5 (पातालखण्डः), अध्याय 82, छंद (76-78)
श्री कृष्ण कहते हैं: हे रुद्र, यह आनंद कंद ही मेरा निज धाम वृन्दावन है। इसमें प्रवेश मात्र से ही जीव सांसारिक आवागमन से मुक्त हो जाता है। जो मूर्ख मेरे इस निज धाम को प्राप्त कर इसे छोड़ कर अन्यत्र जाता है वो आत्म हत्यारा ही होगा। मैंने केवल सत्य और सत्य ही कहा है। मैं वृन्दावन को छोड़ कर अन्य कहीं कभी नहीं जाता एवं उनके (श्री राधा) के साथ नित्य यहाँ वास करता हूँ ।
मद्वनं प्राप्य यो मूढः पुनरन्यत्र गच्छति । स आत्महा भवेदेव सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥ ७७॥
वृंदावनं परित्यज्य नैव गच्छाम्यहं क्वचित् । निवसाम्यनया सार्द्धमहमत्रैव सर्वदा ॥७८॥
- पद्मपुराण, खण्डः 5 (पातालखण्डः), अध्याय 82, छंद (76-78)
श्री कृष्ण कहते हैं: हे रुद्र, यह आनंद कंद ही मेरा निज धाम वृन्दावन है। इसमें प्रवेश मात्र से ही जीव सांसारिक आवागमन से मुक्त हो जाता है। जो मूर्ख मेरे इस निज धाम को प्राप्त कर इसे छोड़ कर अन्यत्र जाता है वो आत्म हत्यारा ही होगा। मैंने केवल सत्य और सत्य ही कहा है। मैं वृन्दावन को छोड़ कर अन्य कहीं कभी नहीं जाता एवं उनके (श्री राधा) के साथ नित्य यहाँ वास करता हूँ ।

