वृन्दावन कौ बसिवौ नीकौ ।
जित-जित होई चलत तित ही तित, दीसत है सब जीवन जी कौ ॥ [1]
ठाँ ठाँ सन्त समाज विराजत, गावत हैं जस प्यारी-पी कौ ।
मन के भाल विशाल दियौ है, सन्तत आनंद रस कौ टीकौ ॥ [2]
इहि रस मगन भये तिनकौं सब, लागत वास अनत कौ फीकौ ।
‘दामोदर हित' आन रुचत कैसैं, पायौ है जिन स्वाद अमी कौ ॥ [3]
- श्री हित दामोदर दास
श्री वृंदावन धाम का वास सर्वोत्कृष्ट है । यहाँ प्रिया प्रियतम की ही पग पग पर लीला स्थली विद्यमान है, अत: जहां जहां भी यह मन जाता है वहाँ वहाँ उसके जीवन धन श्यामा श्याम दिखते हैं । [1]
यहाँ ठौर ठौर पर संतों के समाज विराजते हैं जो प्रिया प्रियतम का यशोगान करते हैं । यदि जीव को इस धाम में वास मिल जाये, तो उसके मन के तो भाग्य ही खुल जायें क्योंकि वो इस लीला भूमि में जहां जहां भी जाएगा वहाँ संतत आनंद एवं रस ही मिलेगा । [2]
जिसका मन श्री वृंदावन रस से मगन हो चुका है उसको अन्य सब जगह एवं धाम का वास फीका लगता है । श्री हित दामोदर दास जी कहते हैं कि जिसको श्री वृंदावन रस अर्थात् प्रिया प्रियतम के युगल रस का एक बार भी यदि स्वाद मिल गया हो फिर उसे अन्य कोई रस कैसे रुचिकर हो सकता है ? [3]
जित-जित होई चलत तित ही तित, दीसत है सब जीवन जी कौ ॥ [1]
ठाँ ठाँ सन्त समाज विराजत, गावत हैं जस प्यारी-पी कौ ।
मन के भाल विशाल दियौ है, सन्तत आनंद रस कौ टीकौ ॥ [2]
इहि रस मगन भये तिनकौं सब, लागत वास अनत कौ फीकौ ।
‘दामोदर हित' आन रुचत कैसैं, पायौ है जिन स्वाद अमी कौ ॥ [3]
- श्री हित दामोदर दास
श्री वृंदावन धाम का वास सर्वोत्कृष्ट है । यहाँ प्रिया प्रियतम की ही पग पग पर लीला स्थली विद्यमान है, अत: जहां जहां भी यह मन जाता है वहाँ वहाँ उसके जीवन धन श्यामा श्याम दिखते हैं । [1]
यहाँ ठौर ठौर पर संतों के समाज विराजते हैं जो प्रिया प्रियतम का यशोगान करते हैं । यदि जीव को इस धाम में वास मिल जाये, तो उसके मन के तो भाग्य ही खुल जायें क्योंकि वो इस लीला भूमि में जहां जहां भी जाएगा वहाँ संतत आनंद एवं रस ही मिलेगा । [2]
जिसका मन श्री वृंदावन रस से मगन हो चुका है उसको अन्य सब जगह एवं धाम का वास फीका लगता है । श्री हित दामोदर दास जी कहते हैं कि जिसको श्री वृंदावन रस अर्थात् प्रिया प्रियतम के युगल रस का एक बार भी यदि स्वाद मिल गया हो फिर उसे अन्य कोई रस कैसे रुचिकर हो सकता है ? [3]

