व्यास बड़े हरिके जना, हरि जस में भये लीन ।
तन मन वचसा हरि बिना, और कछू नहिं कीन ॥
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (62)
श्रीहरि के वे अनन्य भक्त ही वास्तव में महान हैं जो अहर्निश उनके पावन यशोगान में मग्न रहते हैं। जिन्होंने तन, मन और वाणी से श्रीहरि के अतिरिक्त अन्य किसी भी लौकिक विषय का अवलंब नहीं लिया, वे ही परम वंदनीय हैं।
तन मन वचसा हरि बिना, और कछू नहिं कीन ॥
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (62)
श्रीहरि के वे अनन्य भक्त ही वास्तव में महान हैं जो अहर्निश उनके पावन यशोगान में मग्न रहते हैं। जिन्होंने तन, मन और वाणी से श्रीहरि के अतिरिक्त अन्य किसी भी लौकिक विषय का अवलंब नहीं लिया, वे ही परम वंदनीय हैं।

