ज्यौं ज्यौं चुनरि सगवगै - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (90)

ज्यौं ज्यौं चुनरि सगवगै - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (90)

(दोहा)
जमुना जल में निरषहीं, झुकि चंचल निज झांहि ।
दोउ जन ठाढ़े लपटि उर, एकहि षुहिया माहि ॥


(पद) [इकताल, राग मल्हार]
ठाढ़े दोउ एकै षुहिया माँहीं ।
बंसीबट तट जमुना जल में, निरषत चंचल झांहीं ॥
कारी कमरिया अंतर दंपति, स्यामा स्याम लपटाहीं ।
श्रीभट कृष्न कूट में कंचन, जल बरषत झलकाहीं ॥

- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (90)

(दोहा)
एक दिन श्रीप्रिया-प्रियतम वंशीवट के निकट श्रीयमुना-किनारे बैठ जल में अपनी चंचल परछाईं देख अति प्रसन्न होते हैं। मेघ की फुहार से बचने के लिए उन्होंने कारी-कमरिया की एक ही खुहिया बनाकर ओढ़ रखी है।

उस शोभा का दर्शन करते हुए श्रीभट्टजी कहते हैं—
(पद)
वंशीवट के निकट कालिन्दी तट पर विराजमान श्रीप्रियाप्रियतम (मंद-मंद पवन के झोकों से दोलायमान होते) जल में अपने हिलते हुए प्रतिबिंब को निहार परम सुख प्राप्त करते हैं। (उसी समय नन्हीं-नन्हीं बूंदों से मेघ बरसने लगा। मेघ बरसता देख सखियाँ अति कोमल, महीन ताग वाली कारी कमरिया की एक ही खुहिया बनाकर उन्हें उड़ा देती हैं)। काली कमली के भीतर युगलकिशोर श्रीश्यामाश्याम (भींजने से बचने के बहाने) परस्पर लिपटे हुए दिखाई देते हैं। एक ही खुहिया के भीतर खड़े श्री प्रियाप्रियतम अति शोभायमान लगते हैं। उस समय की शोभा की उपमा देते हुए श्रीभट्टजी कहते हैं- जिस प्रकार श्याम पर्वत के ऊपर जल बरसता है और भीतर कंचन झलकता है, उसी प्रकार जलवर्षण के समय काली कमली के भीतर श्रीप्रियाजी का कंचनवत् रूप झलकता दिखाई देता है ।