सहज सनेही देहि द्वै - श्री हरिव्यस देवाचार्य, महावाणी, सुरत सुख (27)

सहज सनेही देहि द्वै - श्री हरिव्यस देवाचार्य, महावाणी, सुरत सुख (27)

सहज सनेही देहि द्वै, दीपति दिनहिं अपार ।
नित्यबिहारी जय हूँ या, बिलसनि पर बलिहार ॥

- श्री हरिव्यस देवाचार्य, महावाणी, सुरत सुख (27)

श्रीराधा-कृष्ण स्वभाव से ही परस्पर प्रेमी हैं और उनका यह दिव्य अनुराग नित्य एवं अखंड है। यद्यपि वे दो शरीरों में आभासित होते हैं, किंतु तात्विक रूप से वे एक ही हैं। मैं नित्य-विहारी युगल की इस अखंड विहार-लीला पर स्वयं को निछावर करता हूँ।