हम सौं बाँक न कीजिये, सुनो बाँकेबिहारी ।
ऐंड प्रिंया की सखिन सौं, निवहै न तिहारी ॥ [1]
हौ अमनैत अचाँगरे, सब ही तैं बाँके ।
पै प्रिया भौंह मरोर मैं, जकि रहे सु आँके ॥ [2]
गरज परै जब आपनी, तब करत सुधाई ।
भूल जात रस-छकनि में, यह कौन भलाई ॥ [3]
- श्री किशोरी अलि जी, विनय के पद (51)
एक भक्त श्री प्रिया जी [श्री राधा] के बल से बिहारीजी [कृष्ण] से कहता है कि हे बाँके बिहारी, सुनो! हम से तो तुम बाँकपन (टेडापन) मत ही करो । हम किशोरी जी के बल के गर्व में भरे रहते हैं, हम सखियों से तुम्हारी ऐंड नहीं चल सकती । [1]
यों तो तुम सबसे बाँके हो, पर हमारी प्रिया जी जब भौंहें दिखा देती हैं, तो उस भौंह की मरोड़ में जकड़े रहते हो । [2]
जब अपनी गरज पड़ती है (अर्थात् जब हमारी प्रिया जी तुमसे मान करती हैं) तब तो तुम सीधी तरह व्यवहार करते हो, परंतु जब तुम्हें वे रसपान करवाती हैं तब उसके मद में सब भूल जाते हो । [3]
ऐंड प्रिंया की सखिन सौं, निवहै न तिहारी ॥ [1]
हौ अमनैत अचाँगरे, सब ही तैं बाँके ।
पै प्रिया भौंह मरोर मैं, जकि रहे सु आँके ॥ [2]
गरज परै जब आपनी, तब करत सुधाई ।
भूल जात रस-छकनि में, यह कौन भलाई ॥ [3]
- श्री किशोरी अलि जी, विनय के पद (51)
एक भक्त श्री प्रिया जी [श्री राधा] के बल से बिहारीजी [कृष्ण] से कहता है कि हे बाँके बिहारी, सुनो! हम से तो तुम बाँकपन (टेडापन) मत ही करो । हम किशोरी जी के बल के गर्व में भरे रहते हैं, हम सखियों से तुम्हारी ऐंड नहीं चल सकती । [1]
यों तो तुम सबसे बाँके हो, पर हमारी प्रिया जी जब भौंहें दिखा देती हैं, तो उस भौंह की मरोड़ में जकड़े रहते हो । [2]
जब अपनी गरज पड़ती है (अर्थात् जब हमारी प्रिया जी तुमसे मान करती हैं) तब तो तुम सीधी तरह व्यवहार करते हो, परंतु जब तुम्हें वे रसपान करवाती हैं तब उसके मद में सब भूल जाते हो । [3]

