(राग मालकोश)
मोकों आस स्वामिनी तेरी ।
करे पान विन जुगुलमाधुरी तलफत अंखियां मीनसी मेरी ॥ [1]
परवस प्राण परो नहिं निकसत श्रीवन दरस हिये उरझेरी ।
ललितकिशोरी ढरनि ढरौ निज मिलौ वेगि जनि करौ अवेरी ॥ [2]
- ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (75)
हे स्वामिनी [श्री राधे]! मुझे तो एक मात्र तुम्हारी ही आशा है । युगल रस का पान किए बिना मेरी अखियाँ जल से पृथक मीन के समान तड़प रही हैं । [1]
मेरे प्राण अब वृंदावन के वशीभूत होकर वृंदावन की चाह कर रहे हैं और ह्रदय श्री वृंदावन के दर्शन को व्याकुल हैं । श्री ललित किशोरी कहते हैं कि हे स्वामिनी अपनी कृपा की अब वर्षा कर, मुझसे आप आन मिलो; इसमें अब तनिक भी विलंभ न करो । [2]
मोकों आस स्वामिनी तेरी ।
करे पान विन जुगुलमाधुरी तलफत अंखियां मीनसी मेरी ॥ [1]
परवस प्राण परो नहिं निकसत श्रीवन दरस हिये उरझेरी ।
ललितकिशोरी ढरनि ढरौ निज मिलौ वेगि जनि करौ अवेरी ॥ [2]
- ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (75)
हे स्वामिनी [श्री राधे]! मुझे तो एक मात्र तुम्हारी ही आशा है । युगल रस का पान किए बिना मेरी अखियाँ जल से पृथक मीन के समान तड़प रही हैं । [1]
मेरे प्राण अब वृंदावन के वशीभूत होकर वृंदावन की चाह कर रहे हैं और ह्रदय श्री वृंदावन के दर्शन को व्याकुल हैं । श्री ललित किशोरी कहते हैं कि हे स्वामिनी अपनी कृपा की अब वर्षा कर, मुझसे आप आन मिलो; इसमें अब तनिक भी विलंभ न करो । [2]

