यच्चेतसि स्फुरति नित्त्य विलास  - श्री केशवाचार्य, गोवर्द्धन शतक (10)

यच्चेतसि स्फुरति नित्त्य विलास - श्री केशवाचार्य, गोवर्द्धन शतक (10)

यच्चेतसि स्फुरति नित्त्य विलास धामा शैलाधिपं: सकल केलि कला निधानः ।
कृष्णस्य तस्य पद पद्म रजोऽभिषेक किं नावहेयुरखिलाघशमाय सम्यक् ॥

- श्री केशवाचार्य, गोवर्द्धन शतक (10)

श्री गोवर्धन राज की जय हो जो श्री कृष्ण चंद्र का नित्य विलास धाम हैं जो समस्त केली कलाओं का निधान है । श्री कृष्ण चन्द्र के चरणों से रंजित इस धाम की रज को अपने भाल पर भाव से लगाने से ऐसे कौन से पाप हैं जो नष्ट नहीं हो सकते?