(राग धनाश्री)
रे मन मूरख जनम गँवायौ ।
करि अभिमान विषय को रांचौ, हरि गुण तू नहिं गायौ ॥ [1]
यह संसार फूल सेमर कौ, सुन्दर देखि लुभायौ ।
चाखन लाग्यौ रुई उड़ानी, हाथ कछू नहिं आयौ ॥ [2]
कहा भयौ अब अवसर बीते, पहिलैं नाहिं कमायौ ।
कहत सूर भगवंत-भजन बिनु, सिर धुनि-धुनि पछितायौ ॥ [3]
- श्री सूरदास, सूरसागर
अरे, मूर्ख मन, तू व्यर्थ ही अपने जीवन को गँवा रहा है । तूने अभिमान में भरकर, विषय रस को ही ग्रहण किया और हरि से विमुख होकर हरि का गुणगान नहीं किया । [1]
यह संसार सेमल के फूल के समान है जो पहले तो बहुत सुहाना लगता है, फिर उसमें फल आते हैं किंतु वह फल तो पकने पर तड़क जाता है । उसमें न गुदा होता है न रस केवल रुई जैसे होते हैं जो हवा के साथ उड़ जाता है और हाथ में कुछ नहीं आता । [2]
जब ऐसा स्वर्णिम अवसर (जिसमें तुझे मानव देह मिला है) निकल जाएगा तो तू सोचेगा कि मैंने पहले क्यों नहीं कुछ कमाया । श्री सूरदास जी कहते हैं कि श्री हरि के भजन के बिना तू अंत में सिर पीट पीट कर रोयेगा और पछताएगा । [3]
रे मन मूरख जनम गँवायौ ।
करि अभिमान विषय को रांचौ, हरि गुण तू नहिं गायौ ॥ [1]
यह संसार फूल सेमर कौ, सुन्दर देखि लुभायौ ।
चाखन लाग्यौ रुई उड़ानी, हाथ कछू नहिं आयौ ॥ [2]
कहा भयौ अब अवसर बीते, पहिलैं नाहिं कमायौ ।
कहत सूर भगवंत-भजन बिनु, सिर धुनि-धुनि पछितायौ ॥ [3]
- श्री सूरदास, सूरसागर
अरे, मूर्ख मन, तू व्यर्थ ही अपने जीवन को गँवा रहा है । तूने अभिमान में भरकर, विषय रस को ही ग्रहण किया और हरि से विमुख होकर हरि का गुणगान नहीं किया । [1]
यह संसार सेमल के फूल के समान है जो पहले तो बहुत सुहाना लगता है, फिर उसमें फल आते हैं किंतु वह फल तो पकने पर तड़क जाता है । उसमें न गुदा होता है न रस केवल रुई जैसे होते हैं जो हवा के साथ उड़ जाता है और हाथ में कुछ नहीं आता । [2]
जब ऐसा स्वर्णिम अवसर (जिसमें तुझे मानव देह मिला है) निकल जाएगा तो तू सोचेगा कि मैंने पहले क्यों नहीं कुछ कमाया । श्री सूरदास जी कहते हैं कि श्री हरि के भजन के बिना तू अंत में सिर पीट पीट कर रोयेगा और पछताएगा । [3]

