रसिक नैन नाराचकी, अजब अनोंखी रीत।
दुसमन को परसे नहीं, मारे अपनों मीत॥
- श्री दयाराम जी
रसिकों के नयन-बाणों की अनोखी रीत है, वे दुश्मन का तो स्पर्श तक नहीं करते और अपने मीत को ही मारते हैं।
दुसमन को परसे नहीं, मारे अपनों मीत॥
- श्री दयाराम जी
रसिकों के नयन-बाणों की अनोखी रीत है, वे दुश्मन का तो स्पर्श तक नहीं करते और अपने मीत को ही मारते हैं।

