सुबरन बेलि तमाल सौं, घन सौं दामिनी देह ।
तूँ राजति घनस्याम सौं, राधे सरिस सनेह ॥
- श्री मतिराम, मतिराम सतसई (129)
जिस प्रकार सोने की बेल तमाल वृक्ष से और बादल के संग बिजली शोभित होती है, हे श्री राधे! उसी प्रकार सदृश स्नेह के कारण तुम घनश्याम संग सुशोभित रहती हो।
तूँ राजति घनस्याम सौं, राधे सरिस सनेह ॥
- श्री मतिराम, मतिराम सतसई (129)
जिस प्रकार सोने की बेल तमाल वृक्ष से और बादल के संग बिजली शोभित होती है, हे श्री राधे! उसी प्रकार सदृश स्नेह के कारण तुम घनश्याम संग सुशोभित रहती हो।

