चामीकर चौकी पर चंपक - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (21)

चामीकर चौकी पर चंपक - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (21)

(कवित्त)
चामीकर चौकी पर चंपक-वरन 'हठी'
अंग चमकै चारु चंचलै चलावती। [1]
तारा सी तरंगना सी अतर लगावै रति,
मुकुर दिखावै विजै बीजन डुलावती॥ [2]
कमला करनि जोरै, बिमला सुतृन तोरै,
नवला लै मरजी को अरजी सुनावती। [3]
सुरन की रानी, सुरपालन की रानी,
दिगपालन की रानी द्वार मुजरा न पावती॥ [4]

- श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (21)

स्वर्ण (सोने) के आसन पर चंपक वर्णा श्री किशोरी जी विराजमान हैं, जिनके अंगों की उज्जवल कांति से संपूर्ण निकुंज सुसज्जित है। [1]

दिव्य प्रकाश तथा प्रेम तरंगों से युक्त श्री रति देवी, श्री राधा को इत्र लगा रही हैं एवं सुंदर स्त्रियाँ किशोरी जी को शीशा दिखा रही हैं और चँवर डुला रही हैं। [2]

लक्ष्मी जी हाथ जोड़े खड़ी हैं, सरस्वती जी तिनका तोड़ तोड़ कर श्री राधा की बलिहारी जा रही हैं। नव वधुएँ आज्ञा पा कर श्री किशोरी जी को अर्जी सुना रही हैं। [3]

देवताओं की रानियाँ, सुरपालों की रानियाँ एवं दिगपालों की रानियाँ भी श्री राधारानी के महल के द्वार पर उपस्थित प्रतीक्षा कर रही हैं परंतु भीतर प्रवेश नहीं कर पा रही हैं। [4]