पड़त हौं पैयां कुञ्ज विहारिनी - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (26)

पड़त हौं पैयां कुञ्ज विहारिनी - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (26)

(राग खम्माच)
पड़त हौं पैयां कुञ्ज विहारिनी
गौरांगी वृषभानु दुलारी । [1]
करुणा स्वांति बून्द हों चातक
मुख छबि चन्द चकोरी प्यारी ॥ [2]
औसर नहीं अवसेर करन को
सुन लीजै दरखास्त हमारी । [3]
ललित लड़ैती देहु बास व्रज
पुरिवौ आस भानुपुर वारी ॥ [4]

- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (26)

हे कुंज बिहारिनी, गौर वर्ण वाली, वृषभानु नंदिनी श्री राधे! मैं तुम्हारे चरणों में पड़ता हूँ । जिस प्रकार चातक पक्षी को केवल स्वाति की बूँद की ही अनन्य आशा होती है एवं चकोर पक्षी केवल चंद्रमा को ही एक टुक निहारता है, उसी प्रकार मेरी भी अनन्य आशा एक मात्र आपकी ही करुणा पर टिकी हुई है । [1]

हे प्यारी जू! मानव देह रूपी स्वर्णिम अवसर निकल रहा है, कृपा कर मेरी बिगड़ी बना दीजिए । श्री ललित लड़ैती जी कहते हैं कि हे भानुपुर वारी (बरसाने वारी)! मेरी इतनी विनती है कि मुझे कैसे भी करके ब्रज का वास प्रदान कीजिए । [2]