प्रेम-पंथ को पेंडो हि न्यारो - श्री द्वारकेश जी

प्रेम-पंथ को पेंडो हि न्यारो - श्री द्वारकेश जी

(राग विहाग)
प्रेम-पंथ को पेंडो हि न्यारो ।
दिन नहि चेन रात नहि निद्रा, हृदय बसे जब प्यारो ॥ [1]
जा तन लागी सो तन जानें, दूर होत जग सारो ।
घायल की गति घायल जानें, कछू चले नहि चारो ॥ [2]
नैन बाण की नोक चुभें, विपरीत गति निर्धारो ।
'द्वारकेश’ ऐसे रसिकन पर तन मन सर्वस वारो ॥ [3]

- श्री द्वारकेश जी

प्रेम का मार्ग बहुत निराला है । न दिन में चैन आता है न रात को निद्रा, जब प्रियतम ह्रदय में बसता है । [1]

जिसने प्रेम का अनुभव किया है वही जानता है, कैसे समस्त जग दूर सा लगने लगता है । घायल की स्थिति को पूर्णतः घायल ही समझता है, उस समय कोई उपाय भी नहीं चलता । [2]

प्रियतम के नैनों के नुकीले बाणों की चुभन विपरीत गति को निर्धारित करती है । श्री द्वारकेश जी कहते हैं कि ऐसे प्रभु के प्रेम में रंगे रसिकों पर, मैं अपना तन और मन, सब कुछ समर्पित करता हूँ । [3]