जन्म हुआ भाग्य से पवित्र भूमि वृन्दावन - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (40)

जन्म हुआ भाग्य से पवित्र भूमि वृन्दावन - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (40)

(कवित्त)
जन्म हुआ भाग्य से पवित्र भूमि वृन्दावन,
जन्मने को जहाँ तरसते सुरभूप हैं। [1]
सेवाकुंज वंशीवट कालीदह कुंज वही,
संग के खिलारी श्रीविहारी जी अनूप हैं॥ [2]
यमुना नहाते नित्य रास नित्य करते हैं,
ऊधमी न ज्यादा हैं, उन्हीं के अनुरूप हैं। [3]
श्याम के सखा हैं, हैं सनेही श्याम सुन्दर के,
हम ब्रज -बालक हैं, श्याम के स्वरूप हैं॥ [4]

- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (40)

ब्रजवासी बालक कहता है: 
जहां जन्म लेने के लिए देवताओं का राजा भी तरसता है ऐसी पवित्र भूमि श्री धाम वृंदावन में भाग्य से हमारा जन्म हुआ है। [1]

यह वही सेवाकुंज, वंशीवट, कालीदह एवं अन्य कुंजें हैं जहां श्री बिहारीजी की नित्य अनूप लीलाएँ होती हैं। [2]
 
हम नित्य यमुना नहाते हैं एवं रास नृत्य करते हैं। हम ज़्यादा ऊधमी नहीं श्यामसुन्दर के ही अनुरूप हैं। [3]

हम श्याम सुंदर के सखा भी हैं और उसके प्रेमी भी। हम ब्रज के बालक हैं और श्यामसुन्दर के ही अभिन्न स्वरूप हैं। [4]