आँधे के सिर सम्प्रदा - श्री भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (19)

आँधे के सिर सम्प्रदा - श्री भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (19)

(कुंडलियाँ)
आँधे के सिर सम्प्रदा, नकटे कैसौ पंथ ।
ठगा ठगी संसार में, समुझि लगौ संग कंथ ॥ [1]
समुझि लगौ संग कंथ, कह्यौ जब भामिनि ऐसै ।
निज प्रताप बल चहैं, भलाई उभै न तैसै ॥ [2]
रस स्वादी कोउ मिलै, जाहि गुन दोष न बाँधे ।
भगवत दृष्टा होय, करौ सेवन, तजि आँधे ॥ [3]

- श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (19)

आज कल जो संप्रदायवाद का नाटक चल रहा है उसके दृष्टांत को देखते हुए भगवत रसिक जी कहते हैं: 

एक समझदार एवं रसपरक भामिनी (पत्नी) अपने पति को प्रेमविहीन एवं बहिरंग साधन प्रधान संप्रदाय में दीक्षित देखकर कहती है कि जैसे एक अंधे के पीछे अंधा चलता है, जैसे एक नकटे के बहकावे में आकर दूसरा नाकदार भी अपनी नाक कटवाकर नकटा बन जाता है, ऐसे नकटों के से ये पंथ हैं । हे स्वामी (पतिदेव), ये नीरस सपंद्राय और शुष्क पंथ तो संसार को ठगने के लिए हैं, इनके पीछे कुछ सोच विचार कर ही लगो !  [1]

केवल संप्रदायवाद के यह दुराग्रही, ये लोग तो अपना ही उल्लू सीधा करने के चक्कर में लगे रहते हैं - अपना (एवं संप्रदाय) का ही ऐश्वर्य और यश चाहते हैं, इनका श्री राधा कृष्ण कि विशुद्घ भक्ति से तो लेना देना है नहीं । इसलिए इन पंथों से गुरु शिष्य - दोनों में से किसी का भला नहीं होने वाला है । [2]

हाँ, यदि कोई ऐसा रसास्वादी मिले, जिसे सांसारिक गुण दोषों ने तो न ही बांध रखा हो तथा जो श्रीयगुल की रूप माधुरी में ही वस्तुत: निमग्न रहता हो - तो तुम ऐसे संप्रदायवादी नकटों को त्याग कर उसकी संगति करो, उससे तुमको विशेष लाभ मिलेगा । [3]