(कवित्त)
जोई परा तत्व वृन्दावन में प्रकाश जाकौं,
बेद शिरोभाग उपनिषद न पावैं लख। [1]
जासु रूप ध्यान अति दुर्गम शुकादिकन कौं,
प्रेम सुधा माधुरी की सार जोई शिख नख॥ [2]
छवि सिंधु बोरी नित्य नवलकिशोरी भोरी,
वदन की शोभा मानो चली रूप सीवां नख। [3]
ताकी मुख शोभा अति अद्धुत निहारिवे कौं,
व्याकुल रहत ललचात नित मेरे चख॥ [4]
- श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (76)
अहो जो परम तत्व, केवल श्रीवृन्दावन में ही दृष्टिगोचर होता है, अन्यत्र कहीं नहीं। जिसका वर्णन करने में श्रुति-शिरोभाग उपनिषद् भी समर्थ नहीं हैं। [1]
जिनका रूप ध्यान करना शिव और शुक आदि के लिए भी दुर्गम है, जो प्रेमामृत-माधुरी की सार हैं। [2]
जिनके वदन की शोभा अतुलनीय एवं अपार है, जो नित्य किशोर एवं परम भोरी हैं। [3]
ऐसी श्री राधा महारानी के मुख चन्द्र की अद्धुत शोभा को निहारने के लिये ही मेरे नेत्र सदा व्याकुल और लालायित रहते हैं। [4]
जोई परा तत्व वृन्दावन में प्रकाश जाकौं,
बेद शिरोभाग उपनिषद न पावैं लख। [1]
जासु रूप ध्यान अति दुर्गम शुकादिकन कौं,
प्रेम सुधा माधुरी की सार जोई शिख नख॥ [2]
छवि सिंधु बोरी नित्य नवलकिशोरी भोरी,
वदन की शोभा मानो चली रूप सीवां नख। [3]
ताकी मुख शोभा अति अद्धुत निहारिवे कौं,
व्याकुल रहत ललचात नित मेरे चख॥ [4]
- श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (76)
अहो जो परम तत्व, केवल श्रीवृन्दावन में ही दृष्टिगोचर होता है, अन्यत्र कहीं नहीं। जिसका वर्णन करने में श्रुति-शिरोभाग उपनिषद् भी समर्थ नहीं हैं। [1]
जिनका रूप ध्यान करना शिव और शुक आदि के लिए भी दुर्गम है, जो प्रेमामृत-माधुरी की सार हैं। [2]
जिनके वदन की शोभा अतुलनीय एवं अपार है, जो नित्य किशोर एवं परम भोरी हैं। [3]
ऐसी श्री राधा महारानी के मुख चन्द्र की अद्धुत शोभा को निहारने के लिये ही मेरे नेत्र सदा व्याकुल और लालायित रहते हैं। [4]

