ह्वै अनन्य इक-रस गहै, वृंदावन रस-रीति ।
विधि-निषेध मानै न कछु, करै भजन सौं प्रीति ॥
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन कुण्डलियां (18)
रसिक उपासक को चाहिए कि वह अनन्य भाव से श्री वृंदावन की रस रीति का दृढ़तापूर्वक निर्वाह करे, एवं विधि-निषेधादिक धर्मों को कदापि स्वीकार न करे, केवल रसमय भजन से ही प्रेम रखे।
विधि-निषेध मानै न कछु, करै भजन सौं प्रीति ॥
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन कुण्डलियां (18)
रसिक उपासक को चाहिए कि वह अनन्य भाव से श्री वृंदावन की रस रीति का दृढ़तापूर्वक निर्वाह करे, एवं विधि-निषेधादिक धर्मों को कदापि स्वीकार न करे, केवल रसमय भजन से ही प्रेम रखे।

