धन धन वृन्दाविपिन गुसाँई ।
आसन डार जाप में बैठें, इन सम दूजो नाहीं ॥ [1]
रज को भान ध्यान हिरदे में, उज्वल रहैं सदाँई ।
अभयराम ये महानुभाव हैं, इनके सम कोऊ नाहीं ॥ [2]
- श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (87)
श्री वृंदावन धाम के गोसाईं धन्य धन्य हैं । यह सुंदर आसन डाल कर जप करने बैठते हैं, इनके समान दूसरा कौन होगा । [1]
इनको वृंदावन की रज के महत्व का सदा तत्वज्ञान रहता है, इनके ह्रदय में सदा श्री राधा कृष्ण का ध्यान रहता है, इसलिए ये सदा उज्जवल रहते हैं । श्री अभयराम जी कहते हैं कि इन महानुभाव जैसा और कौन होगा ? [2]
आसन डार जाप में बैठें, इन सम दूजो नाहीं ॥ [1]
रज को भान ध्यान हिरदे में, उज्वल रहैं सदाँई ।
अभयराम ये महानुभाव हैं, इनके सम कोऊ नाहीं ॥ [2]
- श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (87)
श्री वृंदावन धाम के गोसाईं धन्य धन्य हैं । यह सुंदर आसन डाल कर जप करने बैठते हैं, इनके समान दूसरा कौन होगा । [1]
इनको वृंदावन की रज के महत्व का सदा तत्वज्ञान रहता है, इनके ह्रदय में सदा श्री राधा कृष्ण का ध्यान रहता है, इसलिए ये सदा उज्जवल रहते हैं । श्री अभयराम जी कहते हैं कि इन महानुभाव जैसा और कौन होगा ? [2]

