जिन पायौ है प्रेम रस, तिनकी औरहि भांति।
देह गेह की सुधि नहीं, नेहै हाथ विकांति ॥
- श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री प्रेम मंजरी (7)
जिस रसिक महानुभाव ने प्रेम रस का पान किया होता है, उसकी दशा निराली होती है। उसको शरीर एवं घर की तो सुधि होती नहीं, वे सदा प्रेम में उन्मत्त होकर प्रेम के हाथों बिका हुआ सा होता है।
देह गेह की सुधि नहीं, नेहै हाथ विकांति ॥
- श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री प्रेम मंजरी (7)
जिस रसिक महानुभाव ने प्रेम रस का पान किया होता है, उसकी दशा निराली होती है। उसको शरीर एवं घर की तो सुधि होती नहीं, वे सदा प्रेम में उन्मत्त होकर प्रेम के हाथों बिका हुआ सा होता है।

