रसिक छके युग नेह में - श्री रूप माधुरी जी की वाणी, रसिक पच्चीसी (3)

रसिक छके युग नेह में - श्री रूप माधुरी जी की वाणी, रसिक पच्चीसी (3)

रसिक छके युग नेह में, सब से बेपरवाह ।
रूप माधुरी मस्त है, तजी जगत की चाह ॥

- श्री रूप माधुरी, श्री रूप माधुरी जी की वाणी, रसिक पच्चीसी (3)

रसिक प्रेमी सदा युगल के प्रेम से छके रहकर, समस्त विधि निषेध एवं अन्य किसी की परवाह न करते हुए बेपरवाही में रहते हैं। वे रूप माधुरी में मस्त होकर समस्त जगत की चाह को त्याग देते हैं।