(राग केदारो)
बेठे दोउ कुंज मंडप पिय प्यारी ।
दूल्है हो नवललाल गिरिधारी, दुलही संग श्रीवृषभान दुलारी ॥ [1]
लाल पाग लालन सिर सोभित, नवल सेहरो छवि लागत भारी ।
'गोविंद' प्रभु पिय इह सुख देखत, अपनो तन मन वारी ॥ [2]
- श्री गोविन्द स्वामी, श्री गोविन्द स्वामी जी की वाणी (401)
श्री प्रिया प्रियतम कुंज मंडप में बैठे हैं । श्री कृष्ण चन्द्र दूल्हा बने हैं और श्री राधिका दुल्हन । [1]
श्री कृष्ण के सिर पर लाल पगड़ी और नवल सेहरा सुशोभित है जिसकी छवि मन को मोहने वाली है । श्री गोविंद दास जी कहते हैं कि इस सुंदर छवि का दर्शन कर वे अपने तन मन को न्यौछावर कर रहे हैं । [2]
बेठे दोउ कुंज मंडप पिय प्यारी ।
दूल्है हो नवललाल गिरिधारी, दुलही संग श्रीवृषभान दुलारी ॥ [1]
लाल पाग लालन सिर सोभित, नवल सेहरो छवि लागत भारी ।
'गोविंद' प्रभु पिय इह सुख देखत, अपनो तन मन वारी ॥ [2]
- श्री गोविन्द स्वामी, श्री गोविन्द स्वामी जी की वाणी (401)
श्री प्रिया प्रियतम कुंज मंडप में बैठे हैं । श्री कृष्ण चन्द्र दूल्हा बने हैं और श्री राधिका दुल्हन । [1]
श्री कृष्ण के सिर पर लाल पगड़ी और नवल सेहरा सुशोभित है जिसकी छवि मन को मोहने वाली है । श्री गोविंद दास जी कहते हैं कि इस सुंदर छवि का दर्शन कर वे अपने तन मन को न्यौछावर कर रहे हैं । [2]

