कोउ याहि फाँसी कहत, कोउ कहत तरवार - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (29)

कोउ याहि फाँसी कहत, कोउ कहत तरवार - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (29)

कोउ याहि फाँसी कहत, कोउ कहत तरवार ।
नेजा भाला तीर कोउ, कहत अनोखी ढार ॥

- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (29)

भगवत्प्रेम की विलक्षणता का अनुभव करते हुए रसिक जन इसे भिन्न-भिन्न स्वरूपों में परिभाषित करते हैं। कोई इसे गले की फाँसी मानता है तो कोई पैनी तलवार; कोई इसे भाला कहता है तो कोई अनोखी ढाल के रूप में इसकी व्याख्या करता है।