राधा पद रज स्वाति जल चातक मेरौ हीय - ब्रज के दोहे

राधा पद रज स्वाति जल चातक मेरौ हीय - ब्रज के दोहे

राधा पद रज स्वाति जल, चातक मेरौ हीय।
मोती से अंसुआ ढरैं, मनुआ मन भरि पीय॥

- ब्रज के दोहे

श्रीराधा की पावन चरण-रज मेरे चातक रूपी हृदय के लिए स्वाति नक्षत्र की जल-बूंद के समान जीवनदायिनी है। मोती के समान यह अश्रु हैं, जिन्हें प्रवाहित कर मन भर-भर कर रस पान करता है।