लालहिं बस करनी, मदन मन हरनी - श्री विट्ठल विपुल देव जू की वाणी (8)

लालहिं बस करनी, मदन मन हरनी - श्री विट्ठल विपुल देव जू की वाणी (8)

(राग बिलावल)
लालहिं बस करनी, मदन मन हरनी,
मल्हकि पग धरनी, उरज उदित री । [1]
हेमलता की फरनी, श्रमजल की झरनी,
निकट सुता तरनी, बदन मुदित री ॥ [2]
रूप सुधा की भरनी, मोपै क्यों आवै बरनी,
पिय टकटरनी, तृषित छुधित री । [3]
रस बस कै बरनी, विपुल प्रेम परनी,
‘श्रीबीठल’ कुंज घरनी, बिहारी बुधित री ॥ [4]

- श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की वाणी (8)

रूप की राशि श्रीराधा लाल को सहज ही अपने वश में कर लेने वाली हैं, कामदेव का प्रचंड दर्प तो उन्हें देखते ही चूर चूर हो जाता है, अपने यौवन के उल्लास में वे लचक-लचक कर चलती हैं और शोभा का भार वक्ष्यस्थल को उठाये हुए है । [1] 

उनके अंगों का सौन्दर्य ऐसा है, जैसे स्वण की लता फलित हो रही हो, सुकुमार हैं, इसलिए तनिक-सा भी परिश्रम करने से पसीने के बिंदु झरने लगते हैं, अति प्रसन्न भाव से वे यमुना-पुलिनों में विचरण करती हैं । [2]

उन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि वे रूप के मधुर-आसव से उच्छलित हैं, क्या उनकी ऐसी अद्भुत शोभा का वर्णन सम्भव है ? उन्हें तो उनके प्रियतम भी उस रूप-रस के प्यासे और क्षुधित जैसे निरन्तर एकटक निहारते रहते हैं । [3] 

श्री राधा केवल रस के वशीभूत रहती हैं, वे प्रेम की प्रतिज्ञा को निभाने वाली और निकुज-महल की स्वामिनी हैं, उन्हें तो बस, केवल श्री बिहारी जी ही जानते हैं और कोई उन्हें कैसे जान सकता है ?  [4]